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Wednesday, March 31, 2010

अंतर्मन की सोच...!!! "रोहिणी संकलन" से...

अंतर्मन क्या है......??
किसी ने जाना है उसे...!!
या फिर.........पहचाना है ??
ये ज़रूरी तो नहीं कि जो जानता है,
वो पहचानता भी है...!!

आखिर क्या है ये अंतर्मन..??
हमारी आत्मा की आवाज़...??
या फ़िर कुछ और...??
सुना है........!!!
इस से आवाज़ें आती हैं...!!
क्या कभी सोचा है किसी ने...!!
ये क्यों आती हैं...??
और...किधर से आती हैं...??
आखिर कौन है ये.......??
जो आवाज़ें हमे देता है...??

शायद हमें सचेत करता है....!!
ताकि हमारी भावनायें हम पर
हावी न हों..............!!
क्योंकि हमारी इच्छायें
और महत्वाकांक्षायें तो,
सब इसी में निहित है न,
इसलिये हम पर अंकुश लगाता है ।

ये मन जो हमारी,
अंतरात्मा से जुड़ा है....!!
हमे सदैव सजग करता है |
पथिक जो अपने पथ से
विचलित होता है....!!
उसे सही मार्ग दर्शाता है ।

हमारी भटकन और
हमारी अटकन को,
सही दिशा प्रदान करता है ।
इसलिये शायद हमें....!!
बार-बार टोकता है ।

कहीं ये अंतर्मन........!!
हमारी छठी इन्द्री तो नहीं........??

रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

Monday, March 29, 2010

बिसाल-ए यार...!!! "रोहिणी संकलन" से...

फूलों की बात क्या कहिये,
वो तो रोतों को हंसते हैं,
एक हमारे बिसाल-ए यार हैं,
जो हमें रुलाते हैं |

कहते थे न जायेंगे,
जाते हैं मगर,
छोड़ेंगे न साथ,
ये जताते हैं मगर |

वापसी का देके दिलासा,
हमें बहलाते हैं,
एक हमारे बिसाल-ए यार हैं,
जो हमें रुलाते हैं |

अरमानों की कश्ती,
अक्सर हिलोरे खाती है,
वजह न सही....
बेवजह ही लहराती है |

लहरों के थपेड़ों में वो,
हमें छोड़ जाते हैं,
एक हमारे बिसाले यार हैं,
जो हमें रुलाते है |

है गुरुर ज़ालिम पर,
अपने से भी ज्यादा,
जान देकर भी वो,
निभाएंगे वादा,

बस इस आस में,
रस्मे निभाए जाते हैं,
एक हमारे बिसाले यार हैं,
जो हमें रुलाते है |

दूर जाकर वो हमको,
याद करते हैं या नहीं ?
अपने ही काम में,
मसरूफ रहतें हैं वहीँ |

हम उनकी याद में यहाँ,
आंसू बहाए जाते हैं,
एक हमारे बिसाले यार हैं,
जो हमे रुलाते है |

बेपरवाह है दिल उनका,
ये सदायें आती हैं,
कानों के पर्दों को,
भेद कर निकल जाती हैं,

हम उनकी लापरवाही को,
नज़र अंदाज़ किये जाते हैं,
एक हमारे बिसाले यार हैं,
जो हमे रुलाते है |

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Sunday, March 28, 2010

आगाह...!!! "रोहिणी संकलन" से...

क्या करते हो तुम....??
कितना पाते हो तुम..??
मैं जानती हूँ,
ये कहकर उसने दिल को,
धक्का लगाया था ||

प्यार था आँखों में,
उसके लिए जो,
बरसा वहीँ पर,
ख़तम हो गया था ||

मुझे पता है तुझको,
बहुत दर्द हुआ होगा तब,
पर ये कभी न भूलना,
उसी से कुछ बन गए हो अब ||

जानकर तब उसने,
इनकार किया होगा,
अपने सीने पर शायद,
पत्थर रखा होगा ||

तुम सोचते हो ये,
उसकी नादानी है,
पर तुम्हे ऊपर उठाने में,
उसकी ही मेहरबानी है,

न जाने कब-कहाँ से,
हमें प्रेरणा मिल जाए,
और हम जिंदगी में,
आगे निकल जाएँ ||

तू शुक्र-गुज़ार है उसका,
कभी गुमान न करना,
जिंदगी में कई मोड़ आते हैं,
तू बस उस मोड़ से डरना ||

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Wednesday, March 24, 2010

तमन्ना-ए दिल...!!! "रोहिणी संकलन" से...

Mon Feb 15th at 1:59pm |

मुट्ठी में कौन बाँध पiया है प्यार को,
ये तो उस रेत के मनिन्द है,
जितना कसते हैं फिसलती जाती है |

आग़ोश में कौन भर पाया है चाँद को,
ये तो बस एक परछाई है,
छूने की चाह में सरकती जाती है |

सीमा मे कौन बान्ध पाया है ममता को,
ये तो प्रेम कि नदिया है,
जितना बांटते है बढ़्ती जाती है,

शोषण करके भी कौन रोक पाया है क्रन्ति को,
ये तो एक ज्वाला है,
बुझाने की चाह मे धधकती जाती है,

इर्श्या करने से कौन बचा पायेगा स्वार्थी को,
ये तो एक कुन्ठा है,
जलन की आग मे सुलगती जाती है,

आजतक कौन दबा पाया है इच्छाओं को,
ये भी एक शक्ति है,
मिलन की आस मे व्यक्ति खिंचता चला जाता है,

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बैठी एकांत में....!!! "रोहिणी संकलन" से.....

Tue at 3:20pm | Edit Draft | Discard

बैठी एकांत में सोच रही थी, ऐसा क्यों होता है ??
अकेलापन मनुष्य को काटने को क्यों दौड़ता है ??

अन्दर से आवाज़ आई साथ चल, पता चल जाएगा,
अकेला देखकर तो, हर कोई काटने आएगा||

अकेलापन......क्या अंतर्मन को झकझोर देता है ??
बैठी एकांत में सोच रही थी ऐसा क्यों होता है ??

स्वयं से पूछा....गर कोई काटने आया तो संभल सकेगी क्या ??
जीवन के कटु-सत्य का बोझ सह सकेगी क्या ??

लोग कहते हैं........व्यस्तता जीवन का आधार है,
व्यस्त रहना और व्यस्त दिखना, एक अच्छा विचार है,

पर उसका क्या, जब व्याकुल मन व्यथित होता है ??
बैठी एकांत में सोच रही थी, ऐसा क्यों होता है ??

बादलों की सैर..... कौन कर पाया है आज तक ??
ऑंखें मूँद के सोचें तो भी पता न चलेगा,

इसका काम तो......... बस बरसना ही है,
क्या कोई इसे कभी चीर भी पायेगा ??

लालसा को रहने दो, आखिर मन इसे क्यों ढोता है ??
बैठी एकांत में सोच रही थी, ऐसा क्यों होता है ??

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सच्चा हमसफ़र...!!! "रोहिणी संकलन" से...

Sat 20th March 2010 at 10:37am |

यादों की चिलमन से झाँका किसी ने जब,
मन ये सराबोर होने लगा तब,
बदन मेरा गीला हुआ था पसीने से,
मानो उंडेला हो पानी किसी ने तब |

ऐ दिल तू देना गवाही मेरी जब,
उसे रूह ढूंढे ये प्यासी तड़प तब,
समझ जायेंगे वो किया था बदी ने,
इशारा नसीबा हमारा था खोटा तब |

धुंधला सा साया समेटा था सीने में,
चल दी थी लेकर उसे दूर मै जब,
पर क्या करूं मौत ने रुख ये पलटा,
तब्दील थी कब्र में क़ैद मैं तब |

की थी लाख कोशिश उन्हें ये बताने की,
हम हैं नहीं इस जहाँ में क्या ग़म तब,
मगर देख हैरां हुए हम ने जाना ये,
थे हाथ थामे वहीँ वो खड़े जब |

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द्वन्द.......!!!!!!! "रोहिणी संकलन" से.....

Thursday 18th March 2010 at 5:49pm |

ये कैसा शोर है...........!!
दूर...........गगन में उड़ते हुए मेघों का |
मानो............किसी को ललकार रहे हों,
स्वयं को तेयार कर रहे हों,
किसी द्वन्द के लिए....................!!

द्वन्द..........!! कैसा द्वन्द............??

हाँ........!! ये द्वन्द ही तो है |
वायु के तीव्र वेग का मेघों से द्वन्द,
मेघों का बूंदों से,
बूंदों का धरती से,
धरती का सागर से,
सागर का वायु से,
और वायु का फिर मेघों से |

ये द्वन्द ही तो है.....................!!
जो इस प्रक्रिया को चला रहा है |

कभी सोचा है........................!!
ये द्वन्द अगर समाप्त हो गया तो.....??
प्रकृति का विनाश हो गया तो........??
मानव की कल्पना और कल्पना का स्रोत,
शुन्य हो गया तो......................??

तब क्या होगा.........................??

क्या करेगा मानव.....................??
क्या अपनी आँखों के आगे,
इस सृष्टि का विनाश देख पायेगा........??
नहीं..........!! ऐसा नहीं हो सकता......!!

ये द्वन्द प्रकृति और मानव-कल्याण के लिए है,
शायद इसलिए निर्माता ने,
इसका निर्माण किया है,
इसके निरंतर चलने में ही भलाई है,
ये द्वन्द समाप्त नहीं होना चाहिए ||

नहीं...........!! कभी नहीं...................!!

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प्यार की परख....!!! "रोहिणी संकलन" से.......

Wed 25th March 2010 at 6:27pm

प्यार को छलनी से छाना,
गिरा छन-छनाकर,
छलक सा गया फिर ज़मीं पर |

सोचा की छलके ना,
फिर भी छलक कर गिरा,
छल-छलाया वो फिर वहीँ पर |

छलका के उसको,
छलकना सिखाया था,
अब वो छलकने में माहिर सही पर |

इस छल-छलाहट में,
दिल छल-छालाये पर,
जाकर फिर भी गिरा वो हमीं पर |

छलके तो जाना,
छलक कर ही सीखा,
केवल छलकना ही ठीक नहीं पर |

उसके छलकते ही,
छलनी हुआ मन,
खोजा था हमने नहीं थे कहीं पर |

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मंजिल-ए एहसास...!!! "रोहिणी संकलन" से...

Monday, March 8, 2010 at 3:29pm

जिंदगी मोहताज है मंजिल की,
मंजिल ही रास्ता तय करता है,
मंजिल है तो मज़ा है सफ़र का,
वरना सफ़र बेजान सा कटता है |

बेवफा न कह के बदनाम कर,
यूँ अपने आप को, कुछ नाम कर,
ज़ख्मों के निशां तो मिट जायेंगे,
वफ़ा की उम्मीद में कुछ तो काम कर

ये मत सोच कि जो तन्हाई है,
तेरे लिए वो दर्द-ए जुदाई है,
ये उसी कि मेहरबानी है,
जो तुझे अपनों तक खींच लाई है,

एहसास एक बंधन है, जो दिलों को जोड़ देता है,
भूलने का ख़याल ही मन को झिंझोड़ देता है,
नाज़ुक समझने की इसे भूल न करना तुम,
वक़्त आने पर तो ये दामन भी छोड़ देता है |

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कुछ तो पता चले.......!!!!! "रोहिणी संकलन" से.....

Monday, March 8, 2010 at 6:13pm

लिखने से क्या होता है ??
इस से जिन्दगी नहीं चलती,
जीने के लिए क्या करना है ??
कुछ तो पता चले !!

रोज़ कलम हाथ में लेकर,
जब भी लिखना चाहा कुछ,
समझ न आया क्या लिखना है ??
कुछ तो पता चले !!

उम्मीदें बहुत हैं ज़रिया कम,
कोशिश तो फिर भी करते हैं,
कामयाब नहीं होते क्यों..??
कुछ तो पता चले !!

क्या मुझमें कमी है कोई ??
या खुद पर ऐतबार नहीं है,
कशमकश किस बात की है ??
कुछ तो पता चले !!

दम भी रखते हैं काम करने का,
जोश भी होता है कर गुज़रने का,
सामना करने से क्या घबराते है ??
कुछ तो पता चले !!

उस दिन का इंतजार है,
जो दस्तक दे दरवाज़े पर,
देखें उपहार क्या देता है ??
कुछ तो पता चले !!

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तो क्या हुआ अगर उसने बनाया है...?? "रोहिणी संकलन" से....

Wednesday, March 10, 2010 at 4:28pm

पता नहीं वो कौन है ? जो इतने बड़े ब्रह्माण्ड को
ऊँगली पर नचाये हुए है पर जितना भी सुना है,
यहीं-कहीं हमारे चरों ओर है कैसा दिखता है ?
क्या करता है ? कुछ पता नहीं सुना है...........
हवा जो सांसों के ज़रिये शरीर की धमनियां दौड़ा
रही है, शायद उसमें विद्यमान है

हाँ..........सही है..........वही तो है जो ये सब कर
रहा है शायद उसी ने माटी के पुतले बनाये ?
सोचा होगा.........उसकी बनाई हुई सृष्टि जीवन्त
हो जाएगी..........!! काश............उसे पता होता
आने वाले समय में उसकी रचना ही सृष्टि का
अंत करेगी तो....................!!

समय का चक्र है.........जहाँ से प्रारंभ किया था,
वापसी भी तो उसी दिशा में अनिवार्य है
अन्यथा..............चक्र पूर्ण कैसे होगा ? निर्माण
के पश्चात् विकास.......विकास के पश्चात् विध्वंस
उसके बाद फिर पुनर्निर्माण यही तो सृष्टि का
नियम है

नियम नहीं टूटना चाहिए जो जन्मा है उसका
अंत निश्चित है इसके लिए उसके मायने कभी
नहीं बदलेंगे तभी तो सृष्टिकर्ता को ये आभास
होगा कि कोई भी वस्तु सर्वदा नहीं है
हुंह......तो क्या हुआ अगर उसने बनाया है....!!


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आईने का सच....!!! "रोहिणी संकलन" से.....

Sunday, March 14, 2010 at 6:05pm

आईना तो नाम है उस सच्चाई का,
जो चेहरे कि हक़ीक़त बयां करता है |

अनजान बनकर जिंदगी से इसे,
बदलने की चेष्टा क्यों करता है ??

ग़ुरूर जब भी हद से बढ़ जाता है,
आईना तब-तब आगाह करता है |

कितनी ही कोशिश करें उड़ने की,
औक़ात हमको दिखा ही देता है |

यही सच्चाई है अपने जीवन की,
जब कुछ हासिल नहीं होता है |

सोचकर की सबकुछ ठीक है,
आईना मन को मना ही लेता है |

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दुविधा......???? "रोहिणी संकलन" से.....

Tuesday, March 16, 2010 at 12:42pm

अभी सोच में डूबी थी कि..........क्या लिखना है ?
अचानक पंक्तियाँ होठों पर मानो,
लहर की भांति उभर कर छलक गयीं ||

पता चल ही नहीं सका कि.........क्या लिखना है ?
पर शब्द मेरी बेजान उँगलियों में,
गति बन समाये और अक्षरों को भेद गए ||

सफा कोरा है अभी तक............क्या लिखना है ?
मगर ख्वाहिश हिलोरे ले रही है,
अलफ़ाज़ मिलें तो मैं कुछ बुनना शुरू करूँ ||

सहर हो चली इन्तजार में.........क्या लिखना है ?
लफ्ज़ यूँ ही मिलते रहें तो अच्छा है,
उनके सहारे कागज़ पर लिखते चले गए ||

अभी तक सोच में हूँ कि...........लिखूं ना लिखूं !!
असमंजस का घेरा चारों तरफ है,
पर इस दुविधा में भी पृष्ठ भरते चले गए ||


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ग़र तुम न होते...!!!! "रोहिणी संकलन" से.....

Thursday, March 18, 2010 at 6:01pm

हमें तो कब का इन घर की,
चार-दीवारिओं ने डस लिया होता,
ग़र तुम न होते.........!!

साज़ जो बजता दिखाई दे रहा है,
वो अभी, न बज रहा होता,
ग़र तुम न होते.........!!

होंठों पर छलकता शब्दों का रेला,
कभी, न सज रहा होता,
ग़र तुम न होते.........!!

मेरी तनहाइयाँ ही कब का,
मार डालती इस चार-दिवारी में,
ग़र तुम न होते.........!!

ये बेज़ार मन और कुंठित हृदय,
मुझ पर, हावी हो चुका होता,
ग़र तुम न होते.........!!

शब्दों के इस सुहाने सफ़र का,
मुझे कभी पता भी न चलता,
ग़र तुम न होते.........!!

दिल इच्छाओं का भंवर है,
ये कभी महत्वाकांक्षी न होता,
ग़र तुम न होते........!!

कलम तो ख़यालों की मोहताज है,
ख़यालात सुर्खरू न हो पाते,
ग़र तुम न होते.........!!

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खुश्क निगाहें......!!!! "रोहिणी संकलन" से.....

Friday, March 19, 2010 at 10:21pm

खुश्क निगाहों में ये किसका तसव्वुर है,
जो छुपा बैठा है कहीं कोने में दिल के,
नज़रें इनायत होती तो पता चलता,
हम भी बैठे थे इंतज़ार में |

काश उनका दीदार कहीं हो जाता हमको,
तो एहसास ये दिल का मिट जाता थोड़ा,
तमन्ना-ए खन्जर जो चलाया था कभी,
छोड़ आये उसको मझधार में |

हूक उठी जब सीने में कहीं मेरे,
काबिल नहीं इस क़दर जी सकें हम,
घुट-घुट के रहना गवारा नहीं अब तो,
काटे कटे न पल इस जहान में |

सोचा था ज़बां साथ न दे तो क्या,
आगोश में तो थाम ही लोगे हमको,
मगर खुशकिस्मत नहीं हैं इतने भी,
दिल जीत लें जो ऐतबार में |

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सहा नहीं जाता......!!!! "रोहिणी संकलन" से.....

Mon March 2010 at 1:47pm

बेपनाह मुहब्बत है उनसे,
कि अब रहा नहीं जाता,
नाज़ुक लब रुसवा हों हमसे,
ये अब सहा नहीं जाता |

महफ़िल में खुद हैं अकेले,
कि अब रहा नहीं जाता,
तन्हाई में कट जाएँ रातें,
ये अब सहा नहीं जाता |

हमसफ़र हमकदम नहीं, सोचकर,
अब रहा नहीं जाता,
दर्द-ए जुदाई का ग़म,
अब सहा नहीं जाता |

सिर्फ उनकी यादों के सहारे ही,
अब रहा नहीं जाता,
न मिलने कि जिद और बेरुखापन,
अब सहा नहीं जाता |

दिल के जज़्बात निकले दिल से,
कि अब रहा नहीं जाता,
इस बेमुरव्वत जिंदगी में,
जीने कि मजबूरी को,
अब सहा नहीं जाता ||

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अंकुश..........!! "रोहिणी संकलन" से..........

Tue 23rd March 2010 at 3:30pm

शीश के ये केश काले,
हों ललाट पर जब प्रवाहित,
थाम पायें कर्ण न इनको,
और चक्षुओं को भेद डालें |

हस्त तब क्रोधित हृदय से,
उठ खड़े होते हैं जैसे,
दंड देने के लिए,
केशों को आये हैं यहाँ |

उग्रता में जाने क्या-क्या,
कष्ट कशों को दिया,
केश की स्वच्छंदता को,
समेट कर यूँ रख दिया |

ये परिधि उनकी है,
अंकुश तय हुआ उनके समक्ष,
बांध कर एकजुट में रहना है,
उन्हें उनके समकक्ष |

लक्ष्मण-रेखा संबोधित कर,
तब उन्हें बतलाये वो,
व्यर्थ ही प्रयत्न न कर,
अन्यथा दुःख पाए वो |

हर किसी की हैं सभी,
सीमायें निर्धारित यहाँ,
लांघ कर जो भी गया,
पछताया जीवन भर यहाँ |

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तकरार.....!!!!!! "रोहिणी संकलन" से.........

Wed 24th march 2010 at 3:15pm

आँखों ने आँखों से एक बात बोली,
क्यों हो परेशान लगते मुझे,
आँखों की आँखों को क्या है ज़रूरत,
मुझसे तो है दूर रहना तुझे |

आँखों को आँखों का इतना गुमान,
न कर तू पछताएगी इस क़दर,
आँखों से आँखों तक नफरत है मेरी,
जानू तू है मतलबी बेक़दर |

आँखों में आँखों से जुड़ जाएँ दिल तो,
क्यों हो जरुरत इस संसार की,
आँखों का आँखों तक है साथ मेरा,
क्यों हो ज़रूरत तेरे प्यार की |

आँखों ही आँखों से आंसू बहेंगे,
कुछ भी तेरी आँखों में रहना नहीं,
आँखों ही आँखों में आंसू सही पर,
कुछ और इनमें भरना नहीं |

आँखों ने आँखों से है बात बोली,
अब तो कहना मेरा मान ले,
आँखों को आँखों की होती ज़रूरत है,
अब तो सनम हाथ ये थाम ले |

आँखें नहीं तो ये दुनिया ही क्या है,
बेरंग दिखती हुई एक सहर,
आँखें ही हैं जो हमें खोज लेती हैं,
अक्सर करोड़ों में सुन बेखबर |

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