Pages

Wednesday, March 24, 2010

ग़र तुम न होते...!!!! "रोहिणी संकलन" से.....

Thursday, March 18, 2010 at 6:01pm

हमें तो कब का इन घर की,
चार-दीवारिओं ने डस लिया होता,
ग़र तुम न होते.........!!

साज़ जो बजता दिखाई दे रहा है,
वो अभी, न बज रहा होता,
ग़र तुम न होते.........!!

होंठों पर छलकता शब्दों का रेला,
कभी, न सज रहा होता,
ग़र तुम न होते.........!!

मेरी तनहाइयाँ ही कब का,
मार डालती इस चार-दिवारी में,
ग़र तुम न होते.........!!

ये बेज़ार मन और कुंठित हृदय,
मुझ पर, हावी हो चुका होता,
ग़र तुम न होते.........!!

शब्दों के इस सुहाने सफ़र का,
मुझे कभी पता भी न चलता,
ग़र तुम न होते.........!!

दिल इच्छाओं का भंवर है,
ये कभी महत्वाकांक्षी न होता,
ग़र तुम न होते........!!

कलम तो ख़यालों की मोहताज है,
ख़यालात सुर्खरू न हो पाते,
ग़र तुम न होते.........!!

रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

No comments:

Post a Comment