Thursday, March 18, 2010 at 6:01pm
हमें तो कब का इन घर की,
चार-दीवारिओं ने डस लिया होता,
ग़र तुम न होते.........!!
साज़ जो बजता दिखाई दे रहा है,
वो अभी, न बज रहा होता,
ग़र तुम न होते.........!!
होंठों पर छलकता शब्दों का रेला,
कभी, न सज रहा होता,
ग़र तुम न होते.........!!
मेरी तनहाइयाँ ही कब का,
मार डालती इस चार-दिवारी में,
ग़र तुम न होते.........!!
ये बेज़ार मन और कुंठित हृदय,
मुझ पर, हावी हो चुका होता,
ग़र तुम न होते.........!!
शब्दों के इस सुहाने सफ़र का,
मुझे कभी पता भी न चलता,
ग़र तुम न होते.........!!
दिल इच्छाओं का भंवर है,
ये कभी महत्वाकांक्षी न होता,
ग़र तुम न होते........!!
कलम तो ख़यालों की मोहताज है,
ख़यालात सुर्खरू न हो पाते,
ग़र तुम न होते.........!!
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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