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Monday, June 20, 2016

"तारों का जंजाल"...!!! "रोहिणी संकलन" से...


क्यों इन लकीरों ने,
सीमायें तय कर दी हमारी....? 
जहाँ देखो इनकी रवायत है,
खींचना ही था....... 
तो कुछ और खींचता ये जहां,
क्यों हर तरफ, 
इन रेखाओं की बनावट है....? 

रास्ते सिमट कर,
रह गए हमारे,
सीमा-रेखा को बांधा गया,
इंसान ही इंसान का, 
दुश्मन बन बैठा,
जब भी इसको लांघा गया |

इंसानियत पर हैवानियत,
हावी होती चली जा रही है,
मासूमियत.......... 
अब दहशत बनकर,
दिन-ओ-दिन तब्दील, 
हुई जा रही है |

ऐसे में अपनों का साथ,
शुक्र है..........
ये 'बेतार के तार' (wireless or net)
जुड़े हैं,
अपने गलियारे, चौराहों,
शहरों से जो दूर बसे हैं |

मिटटी की सौंधी-सौंधी-सी,
खुशबू जिनसे गुज़र के आये,
दूर-दूर बैठे अपनों को,
खुशियों से रु-ब-रु कराये |

तारों का जंजाल नहीं बस,
ये तो मायाजाल है,
कोना-कोना बचा न इस से,
चीज़ बड़ी कमाल है |



रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

राज़...!!! "रोहिणी संकलन" से...


आज होंठों पर एक, 
राज़ उभर आया,

बरसों से बन्द, 
ताले का वो,
साज़ उभर आया,

दलीलें लाख़ दी, 
कम्बख़्त ने मगर,

फिर भी न जाने क्यों...?
मुझे मेरे हमदम का,
इंतज़ार नज़र आया.....!

दूर..........
अनन्त काल तक,
दिशा निर्देश देते हुए, 
पथराई सी आँखों में,
चुभन बाक़ी थी,

कशमकश में गुत्थियाँ,
सुलझाते हुए,
जर्जर होंठों की थरथराहट,
बाक़ी थी,

नाख़ुश.......
अपने अंजाम से,
फिर भी,
ख़फ़ा ये दिल,
सोचे........
कितनी गिरहें,
बाक़ी थी.......??


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सुख की नींद...!!! "रोहिणी संकलन" से...

माँ ऐसा तु खिलौना ला दे,
सुख की नींद मैं सो पाऊँ,

आने वाला कल कैसा है...?
क्यों सोचूँ और घबराऊँ |

जीवन क्या है, क्या नहीं,
इस दौड़-भाग से परे रहूँ,

अपने नरम-नरम तकिये संग, 
मीठी-मीठी बात करूँ |

जब सब कुछ मिथ्या है....फिर क्यों,
व्यर्थ मे चिंता वहन करूँ,

कल जो आए कल देखूँगा, 
उसमें आज क्यों नष्ट करूँ |


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हमारी बापूति हमारी धरोहर...!!!"रोहिणी संकलन" से...



घरबार उजड़ी गेन,. पठाल रड़की गेन, 

तिबारी माकु डिंडाल,.खिसिक खिसिक, 

सरकी गेन,

मैं तैं त क्वीनी दिखेंदु,.  औन्दु यख, 

कुजाणि हमार रैबासी,.  कख भटकी गेन,



गुठ्यार की रौनक,, सब चौपट ह्वेगे, 

गोर बाखर क्वीनी रखुदु,.सबतें चुकपट ह्वेगे, 

घास गडोलों की परवाह कैक छ,,ब्वांड जानकी अब, 

सभुतेन निरपत ह्वेगे,



अपणा घर की हालत,,मैन तुम्मा क्या बातोंण, 

यख वखकी छ्वीं बाथ,, मैन तुम्मा क्या लगौंण, 

बूड़ बुड्या याखुली घर छन पोड्याँ, 

जॉन ऊँसन देखण छ,,ऊँका घरबार छन छोड़्यां,



पुंगड़ डोखरकी क्या लगौंण,,, कवि एतेन उमा हौळ लगेजौ, 

सुखी सुखिक बेजान ह्वेगें,, कवि उमा भी रोपण करजौ, 

तिबारिमा बैठिक बड़ाजिकु,,कपालिपर हाथ छ धारयूं, 

क्याकन, कनकै कन,.  सोचिसोचिक प्राण छ सुकैयुं,



ऐजा-ऐजा मेरा लठ्याला, ,एतेन यख मैंभी देखिजा, 

कनरण मैन याखुली,, ये किनार, 

मैन छोड़िक कखिना जा, 

मेरी बुदेंदी आँख्यूंमा,, थोड़ासी तरसखा, 

तुम्हारी पछाण यखी बीटिन छ,, मैंमा यान खौरी नखा, 



हमारी बापूति हमारी धरोहर,, भट्यांणछ लगीं, 

पिछने मुड़िक देखजा,, खुदेंणछ लगीं, 

वींकी बिपदा, वींकी, पीड़ा, ,कैननी सै सकण, 

मेरी माँ मेरी धरोहर अब रोण छ लगीं,..


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