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Friday, September 9, 2011

मदहोश जवानी...!!! "रोहिणी संकलन" से...

ज़िन्दगी की रफ़्तार में,
मदहोश जवानी है,
नशेमन चूर है,
हर शक्स रूमानी है,
रात की चांदनी में,
खोया समां है,
फिर भी क्यों चाहत,
धुवां-धुवां है ?

शहर की गलियों को,
रस में डुबोती,
मय के प्यालों से,
नस-नस भिगोती,
दिन में बसाए हैं,
सब आशियाना,
रात को ढूंढे क्यों,
ठौर-ठिकाना ?

ये बेलगाम सी,
बहती हवाएं,
इनको न जाने,
किस ओर ले जाएँ,
वक़्त है थोडा,
है खुदगर्ज़ ज़माना,
गर हो सके तो,
होश में आना |


रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

Thursday, September 8, 2011

हाथों की लकीरें...!!! "रोहिणी संकलन" से...

हाथों की लकीरों में क्या लिखा है.....?
ये कौन जान पाया है अब तक.....?
रेखाएं अक्सर बदलती रहती हैं,
समय की धुंधली परतें हैं जबतक |

दायीं हथेली में छोटा-सा तिल,
न जाने क्या-क्या कहता है मुझसे...?
करती हूँ जब-जब बंद मैं मुट्ठी,
दिखता है कल एक अलग नज़र से |

कहतें हैं लोग है चन्द्र हथेली में,
चन्द्र शीतलता की पहचान है जानती हूँ,
रेखाएं गहरी हैं, साफ़ हैं, सुथरी भी,
मैं न पढ़ पायी फिर भी अनजान हूँ |

वैसे तो रेखाएं सब बोलती हैं,
क्या है छुपा राज़ सब खोलती हैं,
किस्मत में जो भी लिखा है बताये,
सब जानकर भी न इसको बदल पाए |

मुद्दत हुई इनको देखे हुए अब,
हल्की हुई जा रही हैं ये घिस कर,
रोज़ ये कहती हैं मुझसे अकेले में,
बैठ न यूँ हाथ पर हाथ धर कर |

कर्म तो करना है, करना पड़ेगा,
जो कुछ लिखा है वो सहना पड़ेगा,
यही नियति का नियम है,
बदल मत....................
फल क्या मिलेगा वो खुद तय करेगा |


रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

Monday, September 5, 2011

अधूरापन...!!! "रोहिणी संकलन" से...

by Rohini Negi on Monday, September 5, 2011 at 1:42pm

ऐ मेरे हमसफ़र,
क्या तुझे याद है वो वक़्त.....?

जब तू मुझे,
तन्हाई की वीरानियों में छोड़,
अपनी ख्वाहिशों का दामन पकड़..!
एक राह को चला था................?

तब मेरे पास तेरी यादों के सिवा,
कुछ भी तो नहीं था |

फिर एक अंकुर फूटा,
जिसने इस वीरान दुनिया को,
हरा-भरा बनाकर आबाद किया,
और तेरी यादों का साया कुछ,
धुंधला हो चला.......................|

मैं उसे खाद और पानी देने में व्यस्त थी कि,
फिर वक़्त ने करवट बदली,
और मुझे तेरे सामने ला खड़ा किया |

तसल्ली हुई कि तू मेरे साथ है,
पर वो अंकुर जो पौध की शक्ल ले रहा था,
वो कहाँ है..............................?
अब उसकी यादें मुझे कचोटने लगी है |

मैं जानती हूँ,
तेरा साथ ही मेरे जीवन का मोल है,
पर वो अंकुर भी तो अनमोल है |

उस वक़्त मैं न समझ पायी थी,
दुविधा दोनों ही तरफ भारी थी,
ये सहना कितना बोझिल है...........?
एक बगल में तो दूसरा दिल में है |

इस दुविधा का क्या परिणाम होगा....?
ये अधूरापन मेरा.........कब पूरा होगा.........??

रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com