by Rohini Negi on Monday, September 5, 2011 at 1:42pm
ऐ मेरे हमसफ़र,
क्या तुझे याद है वो वक़्त.....?
जब तू मुझे,
तन्हाई की वीरानियों में छोड़,
अपनी ख्वाहिशों का दामन पकड़..!
एक राह को चला था................?
तब मेरे पास तेरी यादों के सिवा,
कुछ भी तो नहीं था |
फिर एक अंकुर फूटा,
जिसने इस वीरान दुनिया को,
हरा-भरा बनाकर आबाद किया,
और तेरी यादों का साया कुछ,
धुंधला हो चला.......................|
मैं उसे खाद और पानी देने में व्यस्त थी कि,
फिर वक़्त ने करवट बदली,
और मुझे तेरे सामने ला खड़ा किया |
तसल्ली हुई कि तू मेरे साथ है,
पर वो अंकुर जो पौध की शक्ल ले रहा था,
वो कहाँ है..............................?
अब उसकी यादें मुझे कचोटने लगी है |
मैं जानती हूँ,
तेरा साथ ही मेरे जीवन का मोल है,
पर वो अंकुर भी तो अनमोल है |
उस वक़्त मैं न समझ पायी थी,
दुविधा दोनों ही तरफ भारी थी,
ये सहना कितना बोझिल है...........?
एक बगल में तो दूसरा दिल में है |
इस दुविधा का क्या परिणाम होगा....?
ये अधूरापन मेरा.........कब पूरा होगा.........??
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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