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Sunday, April 29, 2012

मां मैं भूखा हूं...!!! "रोहिणी संकलन" से...

Friday 2nd April 2010 at 9:46am | Edit Draft | Discard

जिस मिट्टी को मैने खून से सजाया है,
तपती धूप मे अपना पसीना बहाया है,
धरती का सीना चीर जिसमें हल चलाया है,
उस पर मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥

दिन-प्रतिदिन मैं बद से बद्तर होता जा रहा हूं,
पानी की बूंद के लिये अस्तित्व खोता जा रहा हूं,
क्या होगा परिवार का ? ये सोच रोता जा रहा हूं,
बस अब मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥

गगन की ओर टकटकी लगाये आंखें ये कहती हैं,
अब बरसेगा - तब बरसेगा आस में रहती है,
इस गर्मी की झुलसाहट को आखिर क्यों सहती है?
जरूरी है मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥

ऐ मेघों के देवता अब तो मुझपर पर तरस खा,
रूखे मन से ही सही कुछ देर तो बरस जा,
क्या तब सुनेगा जब यम मेरे ये प्राण हरेगा?
लज्जित न कर मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥

पेट की अग्नि और मन की पीडा अब कही नहीं जाती,
भूख से बिलखती बच्चों की चीखें अब सही नहीं जाती,
मांस से झलकती हड्डियों की बनावट छुई नहीं जाती,
रहम कर मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥

रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

दिल-ए-सुकून...!!! "रोहिणी संकलन" से...


तेरी रह-गुज़र की ख्वाहिश में,
दिल-ए-सुकूं मिटा बैठे,
दुरुस्त-ए-ज़िन्दगी ख्वाब ही रही,
सारी आज़माइश लगा बैठे |

वो यादें ही क्या जो ख़त्म हो,
सिल-सिले उनके नागवार गुज़रे,
चाहत की डोर पकड़े बैठे हैं,
हम तो अब तक उनके आसरे |

बे-वजह, बे-वक़्त,
बे-लगाम ये जिंदगी,
नासाज़-ए-हाल,
बा-बस्ता हैं यारों,
उनकी एक झलक,
पाने को जानिब,
हाल-ए-दिल तरसता है यारों |

ये नज़रें जो चुप-सी रहती हैं,
खामोश ही सही,
कुछ तो बयां करती हैं,
उल्फत के लिए यही काफी है,
मेरे दोस्त.................
जो ऑंखें कहती हैं,
वो अक्सर,
जुबां नहीं कहती |


रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com