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Thursday, July 14, 2022

प्रतार्णा…..!!” रोहिणी संकलन से”…!!


राष्ट्र-भक्ति का अनोखा चिंतन,
मर्म-स्पर्शी वेदना का मंथन,
हृदय-गति को सम्भालकर थामना, 
जीवन में कष्टों का हो जब सामना…!

आरोप-प्रत्यारोपों का प्रकरण,
दिन-रात की कठोर प्रतारणा,
निरंतर शरीर को झकझोरते,
गहरे घावों की वेदना…!

रिक्त-हृदय की पीड़ा अधिक,
और लहु का रिसाव गहरा है,
बिखरे अरमानों के घेरे में, 
जगह-जगह विचारों पर पहरा है…!

प्रकाशहीन-पथ-भ्रष्ट जीवन का,
ये प्रकरण अभी अधूरा है,
संवेदनाओं का सिलसिला रिक्त सही,
प्रतीक्षा में प्रभाव-फेरा है…!!


रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

Wednesday, July 13, 2022

गुजरता वक़्त...!!! रोहिणी संकलन से...



ये वक़्त ..
क्यों गुजरता नहीं..
गुजरते वक़्त के साथ,
तन्हाइयां बेवजह..
नज़दीक चली आती हैं ।

कुछ-एक पल..
दिलबर की रहनुमाई में..
तो इत्मीनान दिलाते हैं,
सेहर होते ही नज़रों से..
गायब हो जाते हैं ।

रोने को यूँ तो..
बहुत है आँखें..
सिर्फ आंसू बहाने को,
साथ निभाने के नाम पर..
सब लौट जाते हैं ।


रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

लम्हा जिंदगी का...!!! रोहिणी संकलन से...

फासले ग़म को हवा देते हैं,
तेरा इख्तयार है मुझ पर,
चल कुछ लम्हे चुरा लेते हैं,

बंदिशें तोड़ खामोशियों की,
पीकर देख अगन भीतर की,
ये लगाव, ये खिंचाव, 
कितना सच्चा है,
ऐसे मे....।
क्या मूक रहना अच्छा है ??

उखड़ती साँसों मे,
अल्फ़ाज़ों का समंदर,
यूं-ही सिमट कर रह गया|
जो लम्हा जहां था,
बस वहीं पर थम गया |

समय रहते गलती,
सुधार तो दी हमने,
पर उसी लम्हे की, 
ताज-पोशी मे,
जिंदगी गुज़ार दी हमने |


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दिन-चर्या...!!! "रोहिणी संकलन" से...

बरखा भी नि झुरौणी, 
येक बूंद पाणिक भी नि औणी, 
गोर-बाछरोंकु लराट छ जोड्यु, 
गुठ्यार मा, 
त्यु द्योर भी नि बर्खीणी | 

हे मेरी ब्वे, निरास हवेगे, 
कुएड़ी-कुएड़ू छ दिखेड़ी, 
पार डाँड तू, 
पण ते द्योरतें, 
कन चुकपट पोड़गे |
 
सुबेर 4 बजी उठी तें, 
धार बिटिन पाणि लैगें, 
गुठ्यार्कु मोल गाड़ ले, 
भैंसी ज्वा रमौणी छ, 
वींमू घास भी धोल ले, 
पण चौसिंग्या लगोठ, 
मजाण कख लूकिगे |      

म्यार दग्ड्या सौब घस्यार, 
कबारि पैट गेन, 
थक गेन बिचार, 
मैं धई लगे तेन | 
दाथुड़ी अर डोरीड़ि, 
कुजाणी कख धोलि मैन,
खोजि-खोजिक पराण मेरु, 
जुकीड़ी तु ऐगे | 

"जीहोर" द्याखल त, 
खैर नि छ मेरी, 
कल्योकि त फंड फुका, 
पाणिन भरलु तब गेरी |
खाणु पकौण त दूरकि बात छ, 
चुल्लू भी नि जगौण देणी, 
हे मेरी माँजी तब मैन,
क्या सुदी ख़ाब खेच्णि...... ? 
 
 
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"टायसन"...मेरा हीरो…!!! "रोहिणी संकलन" से...

 
अब ये दौर
कितना प्रसिद्ध हो चला है,  
तस्वीर देख कर तो,
ये सिद्ध हो चला है,  
आँखों मे चश्मा,
पंजों पर "की-पैड" है,  
"डौगी" को देखो,
करता ये "चैट" है |  

मेरा "टायसन",
इतना एडवांस है,  
"फ़ेस-बुक"  पर,
लेता चान्स है,  
"फिमेल फ्रेंड्स" से,
करता "रोमांस" है,  
तभी तो इसका,
अपना "ग्लान्स" है |

न जाने आजतक,
कितनों को पटाया है,
"फ्रेंड-रिक्वेस्ट" भेज कर,
कितनों को सताया है,  
"कनफर्म" किया तो समझो,
बात बन जाएगी,  
गर नहीं किया तो कोई,
दूसरी "लाइन" पर आएगी |

दिन मे उसके पास,
फुर्सत के यही पल खाली हैं,  
क्योंकि......रात "घर" की,
करनी भी तो रखवाली है,  
अपना काम निभाना,
वो बख़ूबी जानता है,  
तभी तो सारा "ब्लौक",
उससे थर-थर काँपता है |

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'होरी' आई...!!! "रोहिणी संकलन" से...

रंग भरी पिचकारी,
मोहे देख साँवरिया,
दे मारी.............!

भीजी अंगिया सारी,

लाज-शरम की मारी,
मैं बेचारी..........!


पलटन बड़ी ये भारी,
रंगने सखियों संग दौड़ी,
राधा प्यारी.......!


काहे बैर लिया हमसे,
हमने जुगत लगाई,
आज नहीं छोड़ेंगे सबको,
रंग दो 'होरी' आई...!!


इंद्र-धनुष के तार,
रंगों की बौछार,
ख़ुशियों का संसार,
दुआ यही हर-बार,


सुखी रहें घर-बार,
इस................ 

होली के त्योहार.....!!
बुरा न मानो......होली है........!!



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पहचान...!!!

मुसल-सल अश्क बहने की एवज़ में,
चंद लम्हात ख़ुशी के मिले
तो क्या मिले.....?
सीने पर पत्थर की मानिंद ये बोझ,
उठाये नहीं उठता मुझसे....!

उनसे राफ़्ता हुआ जो मेरा
तो जाना ये जिंदगी.........!
दो-पाटों में बँट कर,
फँस गयी है कहीं,
एक........जिसकी मैं पहचान हूँ.........!

दूसरा...जिसे जानकर भी अनजान हूँ...!


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चूहा...!!!


पकड़-पकड़
कस के जकड़,
वरना भाग जाएगा।

बदमाश बड़ा है
ज़मीन पर रगड़,
ख़ूब सताएगा

नुक़सान करता है,
सामान चुराता है,
जब देखो हमारी
चीज़ें खा जाता है।

सिरदर्द बना है सबका
जाने कहाँ से टपका

कौन इसे पकड़ेगा पहले,
शर्त यही लगाते हैं,
घर का कोना-कोना,
घरवाले छान मारते हैं।

ढूँढो उसको सारे मिलकर,
घर के किस कोने में छुपा है,
अरे बाबा- कोई और नहीं है,
वो एक मोटा  "चूहा"  है।😜


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"नव-निर्माण"...!!! "रोहिणी संकलन" से...

 
शांत खड़ी मैं देख रही थी एक लोभी का लोभ, 
चीख-चीख कर सब को बुलाये देता था प्रलोभ |

उसकी शक्कर जैसी बातें रक्त-चाप को बढ़ाती,
कभी वो मुझको कभी मैं उसको कंखियों से बुलाती |

बातें बनावटी कर-कर के जाने क्या रस घोला,
जितने भी थे आस-पास उन सब का मन था डोला |

झूठी अफवाहों के पीछे "सच" बेचारा सिमट गया,
अपना कफन वो खुद पे लपेटे जा के ज़मीं से लिपट गया |

दफन हुआ गहरायी मे फिर कभी न ऊपर वो आया,
झूठ अब यारों राज कर रहा सच का तो साम्राज्य गया |

मेरी विनति है सब से क्यों हम ऐसों का साथ निभाएँ,
जो सच को पर्दे मे रखते और झूठों का मुकुट लगाए |

वापिस फिर से वही दौर हो दूर हो सारी अटकलें,
कपट, निराशा, झूठ नहीं हो हर कोई सच्ची राह चले |

आओ हम सब मिलकर प्रण लें ऐसा नव-निर्माण करें,
बस आदमी....आदमी न हो.......एक अच्छा इंसान बने | 


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"परख"...!!! "रोहिणी संकलन" से...


किसी ने कहा...
हम अपने हैं ......तुम्हारे,
किसी ने कहा...
हम उनके हैं सहारे,

जांचा- परखा तो जाना, 
कौन अपना है, 
और कौन बेगाना,
भेड़ कि खाल में,
भेड़ियों को पहचाना,

चेहरा झूठ था सबका,
मुखौटों से छिपा हुआ,
नज़र आया शीशे में,
इस कदर था बिका हुआ,

क्यों हमने ज़िंदगी,
ऐसों के नाम की,
दोगला बनकर जिन्होंने,
हस्तियां बदनाम की,

अच्छा है शीशे ने, 
परख तो करवाई,
कौन - कैसा है,
ये रौशनी तो दिखाई,

वरना हम तो आज भी, 
झांसे में रहते,
बस उनके ढोंग को ही,
अपनापन समझते ||


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