शांत खड़ी मैं देख रही थी एक लोभी का लोभ,
चीख-चीख कर सब को बुलाये देता था प्रलोभ |
उसकी शक्कर जैसी बातें रक्त-चाप को बढ़ाती,
कभी वो मुझको कभी मैं उसको कंखियों से बुलाती |
बातें बनावटी कर-कर के जाने क्या रस घोला,
जितने भी थे आस-पास उन सब का मन था डोला |
झूठी अफवाहों के पीछे "सच" बेचारा सिमट गया,
अपना कफन वो खुद पे लपेटे जा के ज़मीं से लिपट गया |
दफन हुआ गहरायी मे फिर कभी न ऊपर वो आया,
झूठ अब यारों राज कर रहा सच का तो साम्राज्य गया |
मेरी विनति है सब से क्यों हम ऐसों का साथ निभाएँ,
जो सच को पर्दे मे रखते और झूठों का मुकुट लगाए |
वापिस फिर से वही दौर हो दूर हो सारी अटकलें,
कपट, निराशा, झूठ नहीं हो हर कोई सच्ची राह चले |
आओ हम सब मिलकर प्रण लें ऐसा नव-निर्माण करें,
बस आदमी....आदमी न हो.......एक अच्छा इंसान बने |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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