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Sunday, April 18, 2010

काश वो जान पाते...??? "रोहिणी संकलन" से...

Sunday April 18th 2010 at 1:39pm

काश वो जान पाते..........?
हमारे ख्वाबों की हकीकत क्या है ?
यादों और जज्बातों की कहानी में,
या फिर... उस वक़्त की गयी नादानी में,
दिल की दीवानगी का दर्द क्या है ?
काश वो जान पाते...?

हमारे दिलों की सच्चाई क्या है ?
दिए गए वादों की गहराई में,
या फिर... खाई हुई कसमों की दुहाई में,
एक दूजे की रुसवाई का अर्थ क्या है ?
काश वो जान पाते...?

हमारे बिछड़ने का गम क्या है ?
आँखों से होंठो तक बढ़ते कदमों में,
या फिर... इस तन और मन के आकर्षण में,,
भावनाओं के विसर्जन का दर्द क्या है ?
काश वो जान पाते...?

प्यार भरा एहसास क्या है ?
बेचैनी बढ़ाता मन सुनी रातों में,
या फिर... हल्की सी कसक उठती जज्बातों में,
आखिर इस बेवफाई का अर्थ क्या है ?
काश वो जान पाते...?

रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

Tuesday, April 13, 2010

नसीबा...!!! "रोहिणी संकलन" से...

Monday 12th April 2010 at 10:57am | Edit Draft | Discard

बेखुदी में जानेमन,
हाल क्या ये हो गया ?
जी रहे हैं पर न जाने,
क्यों नसीबा सो गया ?

हर तरफ नज़रें दौड़ाये,
हम यही बस खोजते हैं,
अपनी इस दीवानगी से,
रात भर हम जूझते हैं |

नशीली आँखों में उनकी
बस जाने को जी करता है,
आगोश में उनके अब,
जल जाने को जी करता है |

धडकनें जब तेज़ होती हैं,
इस बेजुबां दिल की,
गर्म साँसों में उनकी,
पिघल जाने को जी करता है |

इस कदर है सुरूर छाया,
बुझता अब कुछ नहीं,
दिल कहाँ ये खो गया है,
सूझता अब कुछ नहीं |

उनकी खातिर ही हमने,
ये जग छोड़ा है,
रंगीनियों से परे,
तन्हाई का कफ़न ओढ़ा है |

उनकी यादें अब तो,
सर चढ़ कर बोलती हैं,
रात-बे-रात बस,
मीठा सा रस घोलती हैं |

किसी तरह से उन तक,
बात ये पंहुच जाए,
कुछ ऐसी सूरत निकले,
बिगड़ी बात बन जाए |

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Sunday, April 4, 2010

पंछी और मैं...!!! "रोहिणी संकलन" से...

जैसे वो बंद है, चारों तरफ से क़ैद है,
पिंजरे की सूनी सलाखों के पीछे,
इंतज़ार कर रहा है अपनी रिहाई की,
नम पलकों से आँखों को भींचे |

सोच में डूबा है क्या कसूर था उसका ?
उम्मीद कभी नहीं की थी इस तन्हाई की,
बेबस है लाचार है ये समझ ही न सका,
आखिर क्यों सईयाद ने उससे रुसवाई की ?

आज ये दिन है जब अपनों से इतना दूर है,
पंख फड़फड़ाने के लिए कितना मजबूर है ?
शौक के लिए किया है क़ैद उसको इसक़दर,
क्या यही इस बेदर्द दुनिया का दस्तूर है ?

पंछी और मुझमें कुछ भी तो अंतर नहीं,
असहाय हैं लाचार हैं भेद कुछ भी नहीं,
पिंजरे में बंद हैं दोनों स्वयं से पूछ रहे है,
पंख फ़ैलाने के लिए दोनों ही जूझ रहे हैं |

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