Monday 12th April 2010 at 10:57am | Edit Draft | Discard
बेखुदी में जानेमन,
हाल क्या ये हो गया ?
जी रहे हैं पर न जाने,
क्यों नसीबा सो गया ?
हर तरफ नज़रें दौड़ाये,
हम यही बस खोजते हैं,
अपनी इस दीवानगी से,
रात भर हम जूझते हैं |
नशीली आँखों में उनकी
बस जाने को जी करता है,
आगोश में उनके अब,
जल जाने को जी करता है |
धडकनें जब तेज़ होती हैं,
इस बेजुबां दिल की,
गर्म साँसों में उनकी,
पिघल जाने को जी करता है |
इस कदर है सुरूर छाया,
बुझता अब कुछ नहीं,
दिल कहाँ ये खो गया है,
सूझता अब कुछ नहीं |
उनकी खातिर ही हमने,
ये जग छोड़ा है,
रंगीनियों से परे,
तन्हाई का कफ़न ओढ़ा है |
उनकी यादें अब तो,
सर चढ़ कर बोलती हैं,
रात-बे-रात बस,
मीठा सा रस घोलती हैं |
किसी तरह से उन तक,
बात ये पंहुच जाए,
कुछ ऐसी सूरत निकले,
बिगड़ी बात बन जाए |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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