जैसे वो बंद है, चारों तरफ से क़ैद है,
पिंजरे की सूनी सलाखों के पीछे,
इंतज़ार कर रहा है अपनी रिहाई की,
नम पलकों से आँखों को भींचे |
सोच में डूबा है क्या कसूर था उसका ?
उम्मीद कभी नहीं की थी इस तन्हाई की,
बेबस है लाचार है ये समझ ही न सका,
आखिर क्यों सईयाद ने उससे रुसवाई की ?
आज ये दिन है जब अपनों से इतना दूर है,
पंख फड़फड़ाने के लिए कितना मजबूर है ?
शौक के लिए किया है क़ैद उसको इसक़दर,
क्या यही इस बेदर्द दुनिया का दस्तूर है ?
पंछी और मुझमें कुछ भी तो अंतर नहीं,
असहाय हैं लाचार हैं भेद कुछ भी नहीं,
पिंजरे में बंद हैं दोनों स्वयं से पूछ रहे है,
पंख फ़ैलाने के लिए दोनों ही जूझ रहे हैं |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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