दूर-दराज़ से पंख फैलाये,
मेरे ख्यालों में इस तरह से,
कोई चला आए......
कुछ ऐसी आहट लिए,
कि हम ये मन मसोस के रह जाएँ |
न कुछ करते बनता है,
न कुछ कहते बनता है,
इन सूनी-खामोश लहरों में,
एक तूफ़ान - सा पलता है |
ये तूफ़ान संभल पायेगा या नहीं,
लहरों में उठा उफ़ान.........
थम पायेगा या नहीं,
दिल में उमड़ते हुए जज़्बात,
अब हवा देने लगे हैं,
कोई हमें ये बता जाता,
दिल का ग़ुबार निकल पायेगा या नहीं |
अब तो फ़क़त एक आरज़ू बन गयी है,
मेर होंठों पर स्याही सी जम गयी है,
काश कोई कलम ही उठा लेता....
और इस स्याही से दो हर्फ़ ही लिख डालता |
शायद वो हर्फ़ दिल को करार देते,
बेड़ियों में जकड़े जज़्बात,
भीतर की वीरानियाँ छोड़,
उमड़ के आते............!!
तोड़ के अपनी सीमाओं को,
बाग़ी बन जाते...........|
पर अफ़सोस कि ये हो नहीं सकता,
कुछ भी हो................
व्यक्ति मर्यादा खो नहीं सकता,
भले ही इच्छाएं पंख फैलाती हों,
पर अन्दर का ज़मीर.........
कभी सो नहीं सकता |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com