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Monday, November 29, 2010

वादा....!!! "रोहिणी संकलन" से...

Created on Sep-17th 2010 at 9:30pm.

हम तो उन्हें भुलाये बैठे थे,
अफसानों में कहीं दफनाये बैठे थे,
उनकी याद न आये.......
कभी-किसी मोड़ पर,
ऐसा इंतज़ाम कराये बैठे थे .....!!

पर इस कमबख्त,
शराब ने धोखा दिया,
गले उतरते ही,
ज़बां से सौदा किया,
वो जब लड़खड़ाई बे-तहाशा,
अपने सुरूर में,
हम बड़-बड़ाये चले गए,
उसके गुरूर में.....!!

ये बात यहीं ख़त्म होती....
तो और बात थी,
ज़बां सिर्फ दास्तान-ए दिल सुनाती...
तो और बात थी,
पर जिस बात पर हम,
आजतक इतराये बैठे थे,
अब उसी की महफ़िल में जाकर,
शमा जलाये बैठे थे.....!!

उन पर पड़ते ही नज़र,
ये सवाल आ गया,
बेजान रूह में जैसे,
भुन्चाल आ गया,
फिर धुंधली सी याद सताने लगी,
पर था न मिलने का वादा....
ये ख़याल आ गया........!!


रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

Saturday, November 27, 2010

दिल तो समंदर है...!!! "रोहिणी संकलन" से...

किसी ने कहा मुझसे...........!
दिल तो समंदर है आपका.....!
कभी मीठा तो कभी नमकीन..!
लगता है ख्वाब सा.....!

मीठा तब होता है जब,
अपने-पन का अहसास कराता है,
नमकीन तब........जब,
खट्टे अनुभवों की याद दिलाता है |

दोनों के बिना ये जिंदगी,
कितनी अधूरी है..........?
इसे पूर्ण करने के लिए,
संतुलन बहुत ज़रूरी है |

कम- ज्यादा हो तो समझो,
मामला...........संगीन है,
सुंदर मिश्रण बन जाए गर तो,
जिंदगी फिर रंगीन है |

दोनों की ही एहमियत,
अपनी-अपनी जगह है,
'स्वाद' कहते हैं जिसे,
बस यही तो वजह है |

मीठा नमकीन तो सिर्फ नाम के लिए है,
पर इन दोनों ने काम बड़े किये हैं,
जल्द-बाज़ी में न खोना आवेश,
क्योंकि.......................!!
उचित मात्रा का ये समावेश,
बनाता है खुशनुमा परिवेश |


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Thursday, November 18, 2010

माँ का स्नेह...!!! "रोहिणी संकलन" से...

जब कभी बचपन में, यूँ ही अपने अल्हड़पन में,
मन उड़ानें भरता.........दिल मेरा ये कहता,
भैया ही क्यों प्यारे माँ को...?

उनकी हर इच्छा- अभिलाषा,
क्यों सबसे पहले सुनती है...?
वो कुछ बोले इस से पहले,
क्यों उसको सबकुछ देती है...?
यही सोच कर मै भैया से,
ईर्ष्या करती रहती,
वो रो जाए किसी तरह बस,
यही चेष्टा करती |

भैया के ही आस-पास मैं,
बैठी रहती घात लगाए,
कब मेरी बारी आएगी...?
देखूं बस टक-टकी लगाए |
जब मन मेरा व्याकुल होता,
अपने दिल से पूछा करती,
काश अगर मैं छोटी होती,
शायद ज्यादा खुश तब रहती...!

काम-धाम सब अपने छोड़ कर,
तब माँ मुझको गले लगाती,
सारा लाड-प्यार वो अपना,
मुझ पर ही न्योछावर करती |

अब माँ मुझको बहलाएगी,
शायद मुझको फुसलाएगी,
पर मन की आशा दब जाती,
जब माँ भैया को सहलाती |

मेरी इस मनः स्थिति को,
माँ......झट भांप जाती है,
मुझे बुरा न लगे कहीं तब,
वो मुझको समझाती है |
तू तो पगली सबसे बड़ी है,
तू काहे घबराती है...?
भैया तेरा अभी है छोटा,
कह के काम लग जाती है |

रातों को अक्सर जब मुझको,
स्वप्न कोई...जगा जाए,
नींद मेरी आँखों से ओझल,
कर मुझको डरा जाए |
तब माँ मेरा माथा चूमकर,
मुझको गले लगाती है,
कुछ नहीं है ये कहकर वो,
मन का डर भगाती है |

उसके आँचल का थोडा सुख,
उस पल मैं पा जाती हूँ,
पर अगले ही क्षण माँ को,
भैया संग लेटा पाती हूँ |
तब तो मैं छोटी बच्ची थी,
ना-समझ, मन की कच्ची थी,
कोमल हृदय में न जाने,
क्या-क्या धागे बुनती रहती थी...?

माँ बनकर ही अब जाना है,
माँ का स्नेह अथाह सागर है,
जहाँ तक दृष्टि उसकी जाएगी,
प्रेम रस ही बरसायेगी |
क्या इसकी ममता............ कभी सिमट भी पायेगी....??


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Monday, November 15, 2010

इश्क की किताब...!!! "रोहिणी संकलन" से...

वो इश्क की क़िताब बगल में दबाये बैठे हैं,
और हम हैं की कब से उन्हें उलझाए बैठे है,
जो देते अगर हमें..........तो पढ़ लेते,
न जाने क्यों.....................?
हम से उसे छुपाये बैठे हैं |

गर इजाज़त दें..................!
तो खोल कर उन सफों को,
हम भी कुछ यादें ताज़ा कर लेते,
पलट कर कागज़ के पन्नों से,
हम भी कुछ मज़ा ले लेते |

कहने को ये किताब यूँ तो हमें भी प्यारी है,
दिखता है, उनकी आँखों में कितनी बेकरारी है,
छूप-छुप कर वो अक्सर उसे पढ़ा करते हैं,
और हमें कहते हैं कि वो यादें हमारी हैं |

दिल-ए-नादां कि इजाज़त हो तो कभी,
कलम भी चल जाया करती है इसपर,
खुद दिल कि मुराद पूरी कर लेते हैं वो,
सफ़ेद पन्नो पे काली स्याही से लिखकर |


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