वो इश्क की क़िताब बगल में दबाये बैठे हैं,
और हम हैं की कब से उन्हें उलझाए बैठे है,
जो देते अगर हमें..........तो पढ़ लेते,
न जाने क्यों.....................?
हम से उसे छुपाये बैठे हैं |
गर इजाज़त दें..................!
तो खोल कर उन सफों को,
हम भी कुछ यादें ताज़ा कर लेते,
पलट कर कागज़ के पन्नों से,
हम भी कुछ मज़ा ले लेते |
कहने को ये किताब यूँ तो हमें भी प्यारी है,
दिखता है, उनकी आँखों में कितनी बेकरारी है,
छूप-छुप कर वो अक्सर उसे पढ़ा करते हैं,
और हमें कहते हैं कि वो यादें हमारी हैं |
दिल-ए-नादां कि इजाज़त हो तो कभी,
कलम भी चल जाया करती है इसपर,
खुद दिल कि मुराद पूरी कर लेते हैं वो,
सफ़ेद पन्नो पे काली स्याही से लिखकर |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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