जब कभी बचपन में, यूँ ही अपने अल्हड़पन में,
मन उड़ानें भरता.........दिल मेरा ये कहता,
भैया ही क्यों प्यारे माँ को...?
उनकी हर इच्छा- अभिलाषा,
क्यों सबसे पहले सुनती है...?
वो कुछ बोले इस से पहले,
क्यों उसको सबकुछ देती है...?
यही सोच कर मै भैया से,
ईर्ष्या करती रहती,
वो रो जाए किसी तरह बस,
यही चेष्टा करती |
भैया के ही आस-पास मैं,
बैठी रहती घात लगाए,
कब मेरी बारी आएगी...?
देखूं बस टक-टकी लगाए |
जब मन मेरा व्याकुल होता,
अपने दिल से पूछा करती,
काश अगर मैं छोटी होती,
शायद ज्यादा खुश तब रहती...!
काम-धाम सब अपने छोड़ कर,
तब माँ मुझको गले लगाती,
सारा लाड-प्यार वो अपना,
मुझ पर ही न्योछावर करती |
अब माँ मुझको बहलाएगी,
शायद मुझको फुसलाएगी,
पर मन की आशा दब जाती,
जब माँ भैया को सहलाती |
मेरी इस मनः स्थिति को,
माँ......झट भांप जाती है,
मुझे बुरा न लगे कहीं तब,
वो मुझको समझाती है |
तू तो पगली सबसे बड़ी है,
तू काहे घबराती है...?
भैया तेरा अभी है छोटा,
कह के काम लग जाती है |
रातों को अक्सर जब मुझको,
स्वप्न कोई...जगा जाए,
नींद मेरी आँखों से ओझल,
कर मुझको डरा जाए |
तब माँ मेरा माथा चूमकर,
मुझको गले लगाती है,
कुछ नहीं है ये कहकर वो,
मन का डर भगाती है |
उसके आँचल का थोडा सुख,
उस पल मैं पा जाती हूँ,
पर अगले ही क्षण माँ को,
भैया संग लेटा पाती हूँ |
तब तो मैं छोटी बच्ची थी,
ना-समझ, मन की कच्ची थी,
कोमल हृदय में न जाने,
क्या-क्या धागे बुनती रहती थी...?
माँ बनकर ही अब जाना है,
माँ का स्नेह अथाह सागर है,
जहाँ तक दृष्टि उसकी जाएगी,
प्रेम रस ही बरसायेगी |
क्या इसकी ममता............ कभी सिमट भी पायेगी....??
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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