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Saturday, October 30, 2010

जैसे जानते नहीं...!!! "रोहिणी संकलन" से...


वो मिले महफ़िल में ऐसे की जानते नहीं,
देखा यूँ......... की हमें पहचानते नहीं,
नज़रों को हमसे चुराए चले गए,
कतार में हम भी है पर मानते नहीं |

सुना है महफिलें ही अक्सर रुसवा करती हैं,
साज़-ए- दिल में क्या है, बयां करती हैं,
ये जहाँ जान जाये न कहीं बेकरारी को,
इसलिए हर एक सांस ये दुआ करती हैं |

कभी कनखियों से देखकर गुज़ारा करते हैं,
कभी झरोखों से इशारा करते हैं,
पर्दा नशीनों की हालत ही कुछ ऐसी है,
अक्सर छुप-छुप कर ही नज़ारा करते हैं |

छुपते फिरते हैं लोगों से नज़रें चुराए,
कहीं पढ़ न ले निगाहों में अरमां छुपाये...??
खलिश इस दिल की जीने नहीं देती,
यही सोचते हैं कैसे इस दिल को मनाएं...??

उनकी इस हरकत पर तिलमिलाहट होती है,
बैचैन करती है वो कस-मसाहट होती है,
सुरूर चाहत का सर चढ़ कर बोलता है,
कोई जवाब न आये उधर से तो छट-पटाहट होती है|

ऐ खुदा मेरे यार को सलामत रखना,
उसे किसी की नज़र न लगे ये ध्यान रखना,
अभी तो जिंदगी कोसों चलनी है उसे,
हो सके तो सफ़र में ख़याल रखना |

रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

Thursday, October 28, 2010

शाख और मैं...!!! "रोहिणी संकलन" से...

एक शाख ने पूछा मुझसे यूँ,
तू उदास है मेरे लिए.........बता क्यों......?

मैं बोली......मैं वो दिन याद करती हूँ,
जब यहाँ प्रकृति का जाल बिछा था,
चारों तरफ हरियाली ही हरियाली थी,
जीवन जीने का साज़ छिपा था |

आखों में तैरता क्या अद्भुत नज़ारा था...?
जो कुदरत ने कभी इस धरती पर उतरा था,
भोर होते ही सूरज की किरणे,
छरहरे बदन को नहलाती थी,
और उसकी लालिमा झुरमुट से,
अक्सर छन-छन कर आती थी |

अब तो यहाँ दूर-दूर तक दिखता विराना है,
न पक्षियों की चह- चहाट,
न जानवरों का ठिकाना है,
विकास के नाम पर किया बस सिर्फ बहाना है,
हे मानव...! तेरे ही कारण आज ये अफसाना है |

शाख बोली.....तू चिंता क्यों करती है....?
मानव प्रवृति ही कुछ ऐसी है,
जो पास नहीं है उसके पीछे दौड़ती है,
जो पास यहीं है उससे पीछा छोडती है |

किरणों की तपिश ही आग बनकर,
अब उसका बदन जलायेगी,
पहले जैसी लालिमा वो,
अब कहाँ से लायेंगी ....?

मेरा क्या है.....?? मैं तो यूँ ही,
इस डाली से चिपकी रहूंगी,
जब तक जान में जान रहेगी,
तब तक ही बस लिपटी रहूंगी |

वो हमेशा ये भूल जाता है कि,
"बहुत कुछ" खोने के बाद ही,
वो "कुछ" पाता है,
समय का चक्र समाप्त होते ही,
तब समझ में आता है |

भले ही चला जाए जिस तरफ,
वापस मुड़ कर आता है,
अपने किये गए कलापों पर ,
फिर शोक जताता है |

मुझे उस दिन का इंतज़ार रहेगा,
जब ये लौट कर मुझतक आएगा,
और नए सिरे से अपनी ,
उजाड़ दुनिया फिर बसाएगा ||

मैं बोली........ये सब सहने की,
ताकत कहाँ से जुटाऊंगी....?
इंतज़ार लम्हों का नहीं, युगों का है,
वो समय कहाँ से लाऊंगी....?

हे मानव..............!
तुझे क्यों समझ नहीं आता है...?
कि तू कोई भगवान नहीं है,
न ही...........भाग्य विधाता है....?


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Thursday, October 21, 2010

न जाने क्यों...??? "रोहिणी संकलन" से...

जब कभी ये ज़ुल्फ़,
तेरे शानों पर लहराई,
न जाने क्यों मुझे,
उसपल की याद आई,
जब मानो काली घटायें,
आसमां का दामन छोड़,
इस ज़मीं पर उतर आई ||

वो तेरा खुली पलकों से,
मुझे एकटक देखना,
और रह रह कर,
मेरी जुल्फों से खेलना,
न जाने क्यों मुझे,
बार-बार याद आता है,
एहसास दिलाता है मुझे,
चाहत के उस पल की,
जो महसूस होता है,
जैसे बात हो कल की ||

न जाने क्यों एक कसक सी,
सीने के किसी कोने में उठती है,
और हलचल सी पैदा करती है,
तारों की दुनिया में,
खो जाने का मन करता है,
न जाने क्यों दिन ढलते ही,
रात का साया मुझे घेर लेता है,
न जाने क्यों..................??



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नन्हा फ़रिश्ता...!!! "रोहिणी संकलन" से...

created on 5/7/10 at 5pm.

ये रिमझिम सी बूँदें,
ज़मीन के ऊपर जब,
टिप-टिप करके गिरती हैं,
तो बदन में एक सिहरन सी उठती है,
यादों का आईना दिल की गहराइयों में डूबा,
हिलोरे लेने लगता है ||

जो आँगन किसी की,
आवाज़ों से वंचित था,
बोलने लगता है,
उमड़ने लगती है वो आस,
जो अब हकीकत बनके,
आँचल में खेलती है,
और तुम्हारी बातों को मानो,
अपनी आँखों से बोलती है ||

उसके गालों के गड्ढे,
उसकी होंठों की हंसी,
उसके हाथों का छूना,
उसके पैरों का चलना,
उसकी हर हरकत तुम्हारी याद दिलाती है ||

रोना, मचलना, सिसकना उसका हँसना,
अदा उसकी सबसे अलग है अनूठी,
नज़र उसको मेरी लगे न कभी-भी,
अगर मैं नज़र भर के देखा करूँ भी ||

उसकी नन्ही-नन्ही अखियाँ,
करती हैं मुझसे बतियाँ,
कहती हैं मुझको उठालो गोद में,
मत रहो तुम इतना सोच में,
ले लो मुझे,उठा लो मुझे,
जितना जी चाहे सतालो मुझे,
मैं जब बड़ा होकर तुमको सताऊँ,
तो फिर कुछ न कहना.....!!!
संभालो मुझे...........!!!!


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Wednesday, October 20, 2010

आरजू...!!! "रोहिणी संकलन" से...

चाहत को मेरी नज़र ढूँढती है,
कैसा सफ़र है तेरा पूछती है..?

अब इस दिल को तेरी आरजू है,
जल्द आये वापस यही जुस्तजू है |
रखी है दिल में छुपाकर,
इक तेरी ही तस्वीर,
और यादें हैं तेरी, जो मेरे रु-ब-रु है |

आँखों में कटती हैं रातें ये सारी,
यही बस दुआ है खुदा से हमारी,
रहो खुश जहाँ हो वहीं पर सदा तुम,
कि हमको तो फिक्र है तुम्हारी |

समंदर जो गहरा है गहराईयों में,
यादें डुबोता चला जा रहा है,
रोके कोई कैसे इसको कि ये तो,
न चाहते हुए भी बढ़ा जा रहा है |

हाल कैसा है तुम रहते हो जहाँ,
क्या एक कागज़ का टुकड़ा भी नहीं,
जिसमे कर सको बयां...??
अपनी तो हालत है ऐसी यहाँ,
कि दिन में सुकून का ठिकाना कहाँ...??

बस ये तसल्ली दिए जाते हैं,
कि जाता है लेकर ज़माना कहाँ..?


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तमन्ना...!!! "रोहिणी संकलन" से...

तमन्ना यही इक,
अगर मान लो तुम,
कि तुम बिन जहाँ में,
हमें कौन प्यारा...??

आहट भी होतो,
लगे दिल को जैसे,
कहीं से कोई,
हमनशीं आ रहा है |

हसरत में डूबे हैं,
हम तो तुम्हारे,
है कौन दूजा,
हमें जो संभाले...??

जहाँ में तुम्हारे,
सिवा है न कोई,
कि बाहें पसारे,
अपलक देखते हैं |

घड़ियाँ जो गिनते हैं,
गिनते ही रहते हैं,
इतना सुकूं है कि,
आओगे इक दिन |

बस बेसब्र होकर,
जीते हैं हम तो,
कि कुछ पल हैं कटते,
और कुछ काटने हैं |


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कब मैंने चाहा...!!! "रोहिणी संकलन" से...

ऐसा खिलौना जो खेले दिलों से,
कब मैंने चाहा था मुझको मिले...??
ऐसा वो फूल जो खुशबू ही न दे,
कब मैंने चाहा था गुल में खिले...??

ऐसी वो यादें जो बेचैन कर दें,
कब मैंने चाहा कि दिल में रहे...??
ऐसा समां जो कहे कुछ न हमसे,
कब मैंने चाहा फिज़ां मे रहे...??

भंवरा जो डोले इधर से उधर तक,
कब मैंने चाह वो बेसुध रहे...??
कलियाँ बुलाये उसे जो चमन में,
कब मैंने चाहा वो न उड़ सके...??

तूफान जो आये कहर बरसाए,
कब मैंने चाहा तबाही मचे...??
सावन जो आये बूंदे गिराए,
कब मैंने चाहा कि आंसू गिरे...??

मेरी जो चाहत है वो मेरी किस्मत है,
कब मैंने चाहा कि फितरत बने...??
मेरी हर एक सांस उनके लिए है,
जिसे मैंने चाह है घड़ियाँ गिने...??

उसे मैंने देखा उस मैंने पाया,
जिसे मैंने पूजा है पलकों टेल,
वाही मेरा हमदम वाही मेरा सबकुछ,
उसी को निभाना है जब वो मिले

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कश-म-कश...!!! "रोहिणी संकलन" से...

यूँ ही बिस्तर पर लेटे-लेटे,
उनका ख्याल आ गया,
क्यों आ गया..?
कश-म-कश में हूँ |

उलझने इस दिल की,
बढती जा रही है,
क्यों बढ़ रही है ?
कश-म-कश में हूँ |

छोटी-छोटी बातें याद आकर,
दिल मेरा झकझोरती हैं,
क्यों झकझोरती हैं..?
कश-म-कश में हूँ |

धीरे से कोई एहसास दिलाता है,
कि आस पास वो है,
क्या वाकई है..?
कश-म-कश में हूँ |

सुर्ख होंठों पर न जाने,
कैसी बेबसी छाई है,
क्यों छाई है..?
कश-म-कश में हूँ |

मदहोश है ये समां,
उनको याद करता है,
फिर भी खामोश है,
क्यों खामोश है..?
कश-म-कश में हूँ |


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दास्तान-ए-मुहोब्बत...!!! "रोहिणी संकलन" से...

created on 25/09/10 at4:00pm


दास्तान-ए-मुहोब्बत क्या सुनाऊं,
यूँही चलते-चलते,
समां गुज़र ही जायेगा,
शाम ढलते-ढलते |

बेताबी इस दिल की,
न जाने कहाँ खो गयी,
भोले-भाले मन को,
इक उदासी सी दे गयी |

ख़ामोशी इस दिल की मुझे,
जीने भी नहीं देती,
सूरत जो तेरी, इन आँखों में बसी है,
मरने ही नहीं देती |

तुम दिल में हो मेरे,
तुम्ही निगाहों में,
कि नहीं आ सकता,
कोई दूसरा इन बाँहों में |

अब ये जिंदगी मेरी,
तेरे ही तो नाम है,
कि जी रहे हैं हम,
इस दिल को थामके |

मंजिलें तो राह में,
अक्सर मिल ही जाती हैं,
कारवां गुज़र जाते हैं,
दास्तानें रह जाती हैं |


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हिचकिचाहट...!!! '"रोहिणी संकलन" से...

Created on August 15th 2010 at 7pm.

खचा-खच भरे कमरे में,
यूँ ही बैठे-बैठे एक दिन,
अपने दिमाग को खरोचा,
सबने मिल कर सोचा,
कुछ अलग करने और दम भरने का...!!
निश्चय हुआ एक मंचन करने का ||

नाम सुनते ही छूटा कम्पन,
सोचा.....मुझसे नहीं हो पायेगा ये मंचन,
मेरे बस की बात नहीं है,
जो भी हो.... मेरे ऐसे हालात नहीं है,
छोडो भी जाने दो......क्या रखा है मंचन में,
मैं खुश हूँ........ अपने इसी प्रवचन में ||

वो बोले......इसमें डरने की क्या बात है....??
किसी-किसी को मिलती ऐसी सौगात है,
खुश-नसीब हो........ जो पता चला है,
बोलने का मौका......भला किसी को मिला है...??
स्टेज फियर भी कोई फियर होता है......??
गर कूदोगे मैदां में.......तो ही दूर होता है ||

मैंने कहा.....मैं नहीं बोल पाऊँगी,
सबके आगे आपना मुंह नहीं खोल पाऊँगी,
गयी तो ये दिल जोर से धड्केगा,
और दर्शकों का गुस्सा मुझपर भड़केगा ||

वो बोले........दिल को थाम कर मंच पर चढ़ना,
जो मन में आये बस वही पढना,
दर्शकों का क्या है...........??
समझे........तो ताली बजायेंगे,
वरना सिर खुजाते रह जायेंगे ||

इसी बात पर उनकी......मैंने दिल को समझाया,
और कविता पाठ करने का मन बनाया,
लम्बी-सी सांस तब अन्दर खिंची,
और अपनी दोनों आँखें जोर से भींची ||

डरते-डरते ही मैंने कदम बढाया था,
जब उसने मुझे ढाढस बंधाया था ||
आँखें खोलते ही सामने दर्शकों को बैठा पाया,
मुख से अनायास ही 'भगवन' निकल आया ||

सबकी निगाहें मुझ पर टिकी थी,
जो तीर की तरह मुझे चुभ रही थी,
फिर डरते हुए मैंने अपना मन बनाया,
और एक ही सांस में सारा 'मुखड़ा' कह सुनाया ||

मुखड़ा सुनते ही सन्नाटा छा गया,
लगा.... दर्शकों को कोई सांप सूंघ गया,
बांध के बोरिया-बिस्तर दिल किया भाग जाये,
इससे पहले की कोई जाग जाये....??

फिर सोचा....ओखली में सर दिया है,
तो मूसल से क्या डरना,
जो होगा बाद में देखा जायेगा,
अभी तो मुझे है कुछ करना ||

पर ये क्या.......!! देख आश्चर्य हुआ,
मेरी पंक्तियों में हर कोई था खोया हुआ,
देख चेहरे पर मुस्कराहट आयी,
दूर हुई.....कुछ देर पहले जो मायूसी थी छाई ||

कविता पाठ ने मेरा आत्मविश्वास जगाया,
कैसे बोला जाता है मंच पर.......ये सिखाया,
डर इंसान को कमज़ोर बनाता है.........सुना था,
पर याद रहेगा........आज के मंचन में,
इसके विपरीत कुछ हुआ था ||


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विडम्बना...!!! "रोहिणी संकलन" से...

Created on 01/10/10 at 9:15

ये कैसी विडम्बना है हमारी.......??
आखिर क्यों है ये लाचारी.........??
क्या हम सब इंसान नहीं हैं......??
अगर हैं......तो क्या एक जान नहीं हैं...??

एक मूल है, एक ही भाषा अपनी,
मात्र यही एक परिभाषा अपनी,
एक प्रान्त है, एक खान-पान है,
जिस पर हमको स्वाभिमान है ||

फिर काहे का द्वन्द छिड़ा है......??
क्यों हर कोई एक-साथ भिड़ा है......??
है तो एक मिट्टी से ही जन्मे,
फिर क्यों हैं लगे... इक-दूजे को छलने..??

ये अलगाव ही था जो बरसों तक,
आपस में हमको बंटवाता रहा,
पास न आ पाया कोई भी,
एक दूसरे को मरवाता रहा ||

तभी कई सदियों तक हमने,
क्रूरता का ही पान किया,
पता नहीं क्या-क्या झेला है..??
अपनों का बलिदान दिया ||

वो जो उच्च शिखर पर बैठा,
अपना उत्तराँचल है ऐसा,
हम से है ये आस लगाए,
कोई उसकी भी सुध ले आये ||

मत सोचो अपने ही लिए तुम,
कुछ उसका भी ध्यान करो,
आपस में यु क्यों कटते हो,
अपनों का तो मान रखो ||

उसकी गरिमा हमें सिखाती,
जड़ को यूँ मज़बूत करो,
कोई तुमको हिला न पाए,
अपनी ऐसी नीव धरो ||

आओ ऑंखें खोले अपनी,
भेद-भाव को दूर करें,
इस से पहले.....कि कोई आकर,
हमको हमसे दूर करे ||

एकता को शक्ति बनाकर,
बात करें बदलाव की,
इक दूजे पर मरहम लगाएं,
क्यों सोचे फिर घाव की ||

कार्य बहुत हैं राह कठिन है,
समय न यूँ बर्बाद करो,
मिलकर साथ हमें है चलना,
उत्तराँचल आबाद करो ||


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