एक शाख ने पूछा मुझसे यूँ,
तू उदास है मेरे लिए.........बता क्यों......?
मैं बोली......मैं वो दिन याद करती हूँ,
जब यहाँ प्रकृति का जाल बिछा था,
चारों तरफ हरियाली ही हरियाली थी,
जीवन जीने का साज़ छिपा था |
आखों में तैरता क्या अद्भुत नज़ारा था...?
जो कुदरत ने कभी इस धरती पर उतरा था,
भोर होते ही सूरज की किरणे,
छरहरे बदन को नहलाती थी,
और उसकी लालिमा झुरमुट से,
अक्सर छन-छन कर आती थी |
अब तो यहाँ दूर-दूर तक दिखता विराना है,
न पक्षियों की चह- चहाट,
न जानवरों का ठिकाना है,
विकास के नाम पर किया बस सिर्फ बहाना है,
हे मानव...! तेरे ही कारण आज ये अफसाना है |
शाख बोली.....तू चिंता क्यों करती है....?
मानव प्रवृति ही कुछ ऐसी है,
जो पास नहीं है उसके पीछे दौड़ती है,
जो पास यहीं है उससे पीछा छोडती है |
किरणों की तपिश ही आग बनकर,
अब उसका बदन जलायेगी,
पहले जैसी लालिमा वो,
अब कहाँ से लायेंगी ....?
मेरा क्या है.....?? मैं तो यूँ ही,
इस डाली से चिपकी रहूंगी,
जब तक जान में जान रहेगी,
तब तक ही बस लिपटी रहूंगी |
वो हमेशा ये भूल जाता है कि,
"बहुत कुछ" खोने के बाद ही,
वो "कुछ" पाता है,
समय का चक्र समाप्त होते ही,
तब समझ में आता है |
भले ही चला जाए जिस तरफ,
वापस मुड़ कर आता है,
अपने किये गए कलापों पर ,
फिर शोक जताता है |
मुझे उस दिन का इंतज़ार रहेगा,
जब ये लौट कर मुझतक आएगा,
और नए सिरे से अपनी ,
उजाड़ दुनिया फिर बसाएगा ||
मैं बोली........ये सब सहने की,
ताकत कहाँ से जुटाऊंगी....?
इंतज़ार लम्हों का नहीं, युगों का है,
वो समय कहाँ से लाऊंगी....?
हे मानव..............!
तुझे क्यों समझ नहीं आता है...?
कि तू कोई भगवान नहीं है,
न ही...........भाग्य विधाता है....?
रोहिणी संकलन से एक रचना.............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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