जब कभी ये ज़ुल्फ़,
तेरे शानों पर लहराई,
न जाने क्यों मुझे,
उसपल की याद आई,
जब मानो काली घटायें,
आसमां का दामन छोड़,
इस ज़मीं पर उतर आई ||
वो तेरा खुली पलकों से,
मुझे एकटक देखना,
और रह रह कर,
मेरी जुल्फों से खेलना,
न जाने क्यों मुझे,
बार-बार याद आता है,
एहसास दिलाता है मुझे,
चाहत के उस पल की,
जो महसूस होता है,
जैसे बात हो कल की ||
न जाने क्यों एक कसक सी,
सीने के किसी कोने में उठती है,
और हलचल सी पैदा करती है,
तारों की दुनिया में,
खो जाने का मन करता है,
न जाने क्यों दिन ढलते ही,
रात का साया मुझे घेर लेता है,
न जाने क्यों..................??
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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