created on 5/7/10 at 5pm.
ये रिमझिम सी बूँदें,
ज़मीन के ऊपर जब,
टिप-टिप करके गिरती हैं,
तो बदन में एक सिहरन सी उठती है,
यादों का आईना दिल की गहराइयों में डूबा,
हिलोरे लेने लगता है ||
जो आँगन किसी की,
आवाज़ों से वंचित था,
बोलने लगता है,
उमड़ने लगती है वो आस,
जो अब हकीकत बनके,
आँचल में खेलती है,
और तुम्हारी बातों को मानो,
अपनी आँखों से बोलती है ||
उसके गालों के गड्ढे,
उसकी होंठों की हंसी,
उसके हाथों का छूना,
उसके पैरों का चलना,
उसकी हर हरकत तुम्हारी याद दिलाती है ||
रोना, मचलना, सिसकना उसका हँसना,
अदा उसकी सबसे अलग है अनूठी,
नज़र उसको मेरी लगे न कभी-भी,
अगर मैं नज़र भर के देखा करूँ भी ||
उसकी नन्ही-नन्ही अखियाँ,
करती हैं मुझसे बतियाँ,
कहती हैं मुझको उठालो गोद में,
मत रहो तुम इतना सोच में,
ले लो मुझे,उठा लो मुझे,
जितना जी चाहे सतालो मुझे,
मैं जब बड़ा होकर तुमको सताऊँ,
तो फिर कुछ न कहना.....!!!
संभालो मुझे...........!!!!
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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