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Thursday, September 13, 2012

वो क्या सोचेंगे...!!! "रोहिणी संकलन" से.....

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गमज़दा होकर हमने भी दो घूँट पी लिए,
पर सुकूं था उनकी तरह जी लिए |
पीते ही झनझनाहट हुई, फिर सिर घूमा,
लगा जैसे हम हवाओं में उड़ लिए |
ये सोचकर कि वो क्या सोचेंगे ?
गले से उतरते ही दिल को जला गया,
जाम जो सीने तक पहुंचा था,
उसको छलनी बना गया |

लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर,
हमेशा आधे-अधूरे रहे |
कभी हमसफ़र की चाह में लख्त-ए जिगर,
तो कभी लख्त-ए जिगर की चाह में,
हमसफ़र से दूर रहे |

ज़िन्दगी से कभी ये तो न चाहा था
अपने आप को दो पाटों में न पाया था |
वो कहते हैं ये जिंदगी तुम्हारी है,
पर जिस दिल से दूर हैं हम,
वो जां भी तो हमारी है |


रोहिणी संकलन से एक रचना...........ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

Wednesday, September 12, 2012

और तुम मुस्कुराए...!!! "रोहिणी संकलन" से...

Saturday, March 6, 2010 at 5:30PM

कितना रोका था हमने,
बेलगाम आंसुओं को.
फिर भी छलक आये,
और तुम मुस्कुराये |

दिलों के तार चाहे,
कितना कि जुड़ जाएँ,
मगर तोड़ आये,
और तुम मुस्कुराये |

छवि हमारी तेरे दिल में,
सिमट कर रह गयी,
हम उफ़ तक न कर पाए,
और तुम मुस्कुराये |

साँसें थम सी जाती थी,
एक आहट पर तेरी,
बेबसी पे हम कसमसाए,
और तुम मुस्कुराये |

हमारी हंसी छीन कर,
ख़ुशी मिलती है ग़र,
तो लेलें जान हम सो जाएँ,
और वो हमेशा मुस्कुराएँ |


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किलकारियां...!!! "रोहिणी संकलन" से...


छत की मुंडेर पर आकर,
दूर आसमां पर बादल देखना,
लगता है जिंदगी बन गयी है |

काश ये बादल आते,
तुझ तक मेरा पैग़ाम पहुंचाते,
कहते कितनी खुशनसीब हूँ मैं,
की मुझे तेरा प्यार मिला,
उसी के इंतज़ार में,
अब ये सेहर गुज़र रही है |

ऐसा करके ये न समझना,
तुम्हें भुला रही हूँ,
वो भी मेरा अरमान है,
जिसे बुला रही हूँ |

अब मेरी जिंदगी में,
एक और भी आएगा,
जो हर दम तेरी याद दिलाएगा,
आकर मेरी सुनी दुनिया को,
अपनी किलकारियों से संवारेगा |

तब उस पल शायद मैं,
सब कुछ भुला जाऊं,
पर एक हसरत रहेगी मेरी,
की तुझको भी उस वक़्त पाऊं |


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मुहोब्बत क्यों की...??? "रोहिणी संकलन" से...

Monday, March 8, 2010 at 2:14pm

दिल में रखकर वो हमें परेशां क्यों होते हैं ?
हद ही तै करनी थी तो मुहोब्बत क्यों की ?
हल्की सी ख़लिश से हैरान क्यों होते हैं ?
सहन न करना था तो मुहोब्बत क्यों की ?

बेवफा निकले वो तो बेज़ुबान क्यों होते हैं ?
शर्मिंदा होना था तो मुहोब्बत क्यों की ?
सामने आये तो पशेमां क्यों होते हैं ?
नज़र नहीं मिलानी थी तो मुहोब्बत क्यों की ?

चुपके से निकल कर अनजान क्यों बनते हैं ?
बात न करनी थी तो मुहब्बत क्यों की ?
कतराये फ़िरते हैं हम से वो क्यों अक्सर ?
हिचकिचाना ही था तो मुहब्बत क्यों की ?

धोख़ा दिया था हमे वो जानते हैं,
पछतावा ही करना था मुहब्बत क्यों की ?
प्यार एक दर्द है सोचकर क्यों रोते हैं ?
पी्डा न सहनी थी तो मुहब्बत क्यों की ?


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घंटी गले की...!!! रोहिणी संकलन से...


by Rohini Shailendra Negi on Tuesday, September 11, 2012 at 11:24am



श्वेत वर्ण है स्याह केश,
उल्झत सुल्झत न भयो तन से,
न कहे न बने कछु बात,
जतन करूँ,
राम बचाए ई जोबन से.......! 

नैन करें बेचैन रात भर,
करवट बदल रहे खटिया पर,
ऊ हमरी कोई बात सुने नहीं,
बईठे हैं बस मूंह फिरा कर....!

कछु कहना कछु सुनना होई तो,
का कहें कईसे कहें हम,
हमरे बस मे अब कछु नाही,
राम ही राखे कहत रहे हम....!

चाहें हमरा ध्यान रखें ऊ,
हमरा थोड़ा मान रखें ऊ,
ई बिपदा को पार लगईके,
कईसन भी उद्धार करें ऊ......!

ऊके नाम की माला अब तो,
बना के घंटी टांग लिए हम, 
प्राण-पखेरू जाये न उड़ कहीं,
गर्दन मा लटकाए लिए हम....!


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