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गमज़दा होकर हमने भी दो घूँट पी लिए,
पर सुकूं था उनकी तरह जी लिए |
पीते ही झनझनाहट हुई, फिर सिर घूमा,
लगा जैसे हम हवाओं में उड़ लिए |
ये सोचकर कि वो क्या सोचेंगे ?
गले से उतरते ही दिल को जला गया,
जाम जो सीने तक पहुंचा था,
उसको छलनी बना गया |
लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर,
हमेशा आधे-अधूरे रहे |
कभी हमसफ़र की चाह में लख्त-ए जिगर,
तो कभी लख्त-ए जिगर की चाह में,
हमसफ़र से दूर रहे |
ज़िन्दगी से कभी ये तो न चाहा था
अपने आप को दो पाटों में न पाया था |
वो कहते हैं ये जिंदगी तुम्हारी है,
पर जिस दिल से दूर हैं हम,
वो जां भी तो हमारी है |
रोहिणी संकलन से एक रचना...........ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
गमज़दा होकर हमने भी दो घूँट पी लिए,
पर सुकूं था उनकी तरह जी लिए |
पीते ही झनझनाहट हुई, फिर सिर घूमा,
लगा जैसे हम हवाओं में उड़ लिए |
ये सोचकर कि वो क्या सोचेंगे ?
गले से उतरते ही दिल को जला गया,
जाम जो सीने तक पहुंचा था,
उसको छलनी बना गया |
लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर,
हमेशा आधे-अधूरे रहे |
कभी हमसफ़र की चाह में लख्त-ए जिगर,
तो कभी लख्त-ए जिगर की चाह में,
हमसफ़र से दूर रहे |
ज़िन्दगी से कभी ये तो न चाहा था
अपने आप को दो पाटों में न पाया था |
वो कहते हैं ये जिंदगी तुम्हारी है,
पर जिस दिल से दूर हैं हम,
वो जां भी तो हमारी है |
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