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Wednesday, April 10, 2013

फितरत...!!! रोहिणी संकलन से...



मग्नून हूँ तेरी उस फितरत का,
जो ज़हन मे नशा-सा भर देती है,
सारी रात पलकों मे कट जाये,
फ़क़त एक इशारा कर देती है |

उल्फ़त-ए-मंजर,
जो एहसास कराता है,
पुतलियाँ नम हो जाती हैं,
राहत-सी मिलती है सीने को,
अंजाना सुकूँ दे जाती है |




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