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Sunday, July 31, 2011

मेरी प्यारी छुटकी...!!! "रोहिणी संकलन से"...

by Rohini Shailendra Negi on Sunday, July 31, 2011 at 12:45pm

दी.........! सिर्फ भाई पर ही लिखा है,
क्या बहन के लिए तेरे पास कुछ नहीं...?
कोशिश कर मुझ पर भी लिखने की...!
शायद कुछ मिल जाए कहीं.......??

मैं भी तो तेरे...........आस-पास ही हूँ,
दिल के अंदर झाँक.........देख ज़रा तू,
शायद मेरी छाया तुझको दिख जाए,
मुझ पर लिखने का अवसर,
शायद तब तुझे मिल जाए...........!!

मैं तो इंतज़ार में हूँ तेरी लेखनी के,
कि मुझ पर भी वो कुछ लिख जाए......?
अपनी काली- नीली रंगत लिए फिर,
कोरे कागज़ पर घिस जाए............??

आज ये कहकर छुटकी ने बस,
भाव-विभोर मुझे कर दिया है,
क्यों पहले नहीं सोचा होगा मैंने...?
जो उसे कहने पर मजबूर किया है.....??

मेरी प्यारी छुटकी ऐसे,
तू मुझसे नाराज़ न हो............!!
तू तो सबकी जान है पगली,
स्वयं चंचल अंदाज़ न खो |

काम कोई हो कभी न डरती,
कुछ करने से पीछे न हटती,
दृढ़-निश्चयी.......हैं अटल इरादे,
तेरी ज़िद के आगे तो हम.......
अपना मस्तक हैं झुकाते |


रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

Wednesday, July 20, 2011

तृप्ति-पान...!!! " रोहिणी संकलन" से...

मैं,
इन आँखों में,
डूबना चाहती हूँ,
छलकता जाम दो.....!

कितनी,
व्याकुल हूँ मैं,
ज्ञात है मुझे,
आधी-अधूरी नहीं,
एक पूरी शाम दो....!

टुकड़ों में,
बंटकर अब,
नहीं जीना चाहती हूँ,
ऐसा इंतज़ाम दो.....!

मेरी,
सुनी रातों को,
अपने आलिंगन से,
सुनहरा अंजाम दो....!

इस अंग से,
अमर-बेल सा,
लिपट कर तुम,
मुझे प्रेम-दान दो....!

स्मरण रहे,
वो स्पर्श,
सदैव अंतर्मन में,
कुछ ऐसी पहचान दो....!

क्या मैं,
इस काबिल भी नहीं,
जो तुम,
इस रिश्ते को,
कोई नाम दो......?

मुझे,
घुटन हो चली है,
इस तृष्णा से,
हो सके तो अब,
तृप्ति-पान दो.........!


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नज़ाकत...!!! "रोहिणी संकलन" से...

चांदनी में चाँद नहाया हुआ सा लगता है,
ये बदन दिलदार की बाहों में,
समाया हुआ सा लगता है,
नज़ाकत भरी नज़रे जो कभी उठे तो,
महबूब से शरमाया हुआ सा लगता है |

न ऐसे देखो कि पानी-पानी हो जाऊं मैं,
न ऐसे छेड़ो कि दीवानी हो जाऊं मैं,
सरकते हुए हाथों का मर्म अब,
लरजते हुए होंठों तक न आये कहीं,
ये तन बोझिल सा लगने लगा है,
कहीं अब डगमगा न जाऊं मैं.....?

नज़दीकियों की तपिश का इतना असर है,
कि हर चीज़ इसके आगे बे-असर है,
हरारत नशा बनकर जिस्म में मेरे,
साँसों को महकाने लगी है,
पलकों से पलकों की कही बातें,
धड़कनों तक अब जाने लगी हैं |

साया उसका मेरे साये को लपेटे हुए है,
जैसे दो-जहाँ की सारी खुशियाँ वो,
अपनी बाँहों में समेटे हुए है,
हल्की-सी हरकत मेरे रोंगटे खड़े कर जाती है,
उसके आगोश में दुनिया सिमट रह जाती है |

ये सुरूर, ये ख़ुमार, ये चाहतों की बारिश,
यूँ हीं होती रहे...........है मेरी दिल-ए-ख्वाहिश,
उसके मद-भरे नैनों का रस पीना चाहती हूँ,
हाँ मैं बस......... उस एक पल को जीना चाहती हूँ |

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सदक़ा...!!! "रोहिणी संकलन" से...

फ़िदा हूँ उसकी बेवफाई पर,
बेवफाई से भी वफ़ा छलके,
ग़म-गीन हूँ इस बात पर,
नम हैं मेरी जो सूखी थी पलकें.....?

पथराये होंठ चुप्पी साधे हैं,
उसकी रुसवायी मेरे सर माथे है,
कुछ ज्यादा ही उम्मीदें कर बैठे,
कहने को बस......ये रिश्ते-नाते हैं |

दिल-ए-ख्वाहिश है मेरी,
खुश रहे खुशबु-ए-चमन में,
हम याद आये न आयें उसे,
वो रहेगा हमेशा हमारे ज़हन में |

महक बना कर उसको अपनी,
साँसों में हम बसा लेंगे,
घोल कर पी जायेंगे ग़म,
सदके में "जान" वार देंगे |

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प्रियवर...!!! "रोहिणी संकलन" से...

लालसा,
तुमसे मिलने की,
बस पीछे-पीछे,
भगाती है,
क्या करूँ.....?

प्रतीक्षा,
क्षण-क्षण,
रूप बदलकर,
डराती है,
क्या करूँ.....?

भय,
तुम्हे खोने का,
सोचते ही मेरी,
रूह थर्राती है,
क्या करूँ.....?

ये व्याकुलता,
निस-दिन,
यूँ ही बढ़ती जाती है,
क्या करूँ.....?

मन की अधीरता,
इच्छाओं को,
और जगाती है,
क्या करूँ.....?

विरह की अग्नि,
मेरे तन को,
तिल-तिल जलाती है,
क्या करूँ.....?

प्रियवर,
कब होगा आगमन,
मिलन की चाह,
रात-दिन तड़पाती हैं,
क्या करूँ.....?

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प्यार का फ़लसफ़ा...!!! "रोहिणी संकलन" से...

लोग कहते हैं प्यार ख़ुदा है,
ग़र है तो फिर डर क्यों.............?

लोग कहते हैं प्यार इबादत है,
ग़र है तो फिर दर्द क्यों.............?

लोग कहते हैं प्यार वरदान है,
ग़र है तो फिर अभिमान क्यों....?

लोग कहते हैं प्यार विश्वास है,
ग़र है तो निराशा क्यों..............?

लोग कहते हैं प्यार शरारत है,
ग़र है तो फिर सज़ा क्यों.........?

लोग कहते हैं प्यार महबूब है,
ग़र है तो फिर आंसू क्यों..........?

लोग कहते हैं प्यार अनंत है,
ग़र है तो फिर इंतज़ार क्यों.....?

लोग कहते हैं प्यार जज़्बा है,
ग़र है तो फिर तड़प क्यों.........?

लोग कहते हैं प्यार फ़लसफ़ा है,
ग़र है तो फिर सोचें क्यों...........?

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Thursday, July 14, 2011

ना चाहूँ कभी...!!! "रोहिणी संकलन" से...

इन आग की लपटों में हम,
झुलसते चले जायेंगे,
जो तू न आया तो,
सुलगते ही रह जायेंगे,
राख का ढेर बनने में,
अब कोई कसर नहीं है,
जो ऐसा हुआ तो,
सब इलज़ाम तुझपर ही आयेंगे |

शमशान के लिए कुछ,
बच भी न पायेगा,
तेरे आने से पहले ही,
वो तो खो जायेगा,
उड़ जाएगा दूर किसी अंधड़ में,
वहाँ जाकर भी तब,
तू क्या कर पायेगा.....?

मेरी यादों को सीने से लगाकर,
तब तुम न रोना कभी,
मैं साथ नहीं तो क्या,
अफ़सोस न करना कभी,
एक शमा की तरह रोशन रहूंगी,
न बनना परवाना कभी,
तुम जलो साथ शमा के,
ये मैं ना चाहूँ कभी |


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Sunday, July 10, 2011

दिलों के रिश्ते ...!!! "रोहिणी संकलन" से...

आँखों और दिलों के रिश्ते ही तो समझ में आते हैं,
दिमाग से किये गए फैसले अक्सर धोखा खाते हैं,
इन्सान कितना भी स्वार्थी क्यों न हो मगर ए-दोस्त,
ये रिश्ते ही आगे चलकर साथ निभाते हैं........|

ये अच्छा-बुरा, नफ़ा-नुक्सान नहीं जानता,
ऊँच-नीच, और जात-पात नहीं मानता,
लोगों में भेद-भाव करना इसके बस की बात नहीं,
आगे इसका क्या हो अंजाम ये नहीं जानता..... |

दिलों से रिश्ते जोड़े जाते हैं व्यापार नहीं,
जहाँ सौदेबाजी का खेल है वहां प्यार नहीं,
नफ़रत के बीज बोने से क्या फायदा ए-दोस्त,
पर ये दिमाग कब समझेगा उसे कोई सरोकार नहीं |

यही विडंबना है इस जीवन की,
दिलों की बात कौन समझता है,
जिसे देखो अपने मतलब के लिए,
हर कोई दिमाग़ से ही चलता है |

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Monday, July 4, 2011

कुसूर...!!! रोहिणी संकलन से...

तू...........मेरी आँखों का नूर है,
ख़्वाब है....इस दिल का सुरूर है,
ग़र.............मुझसे रूठा हुज़ूर है,
तो बता......मेरा क्या कुसूर है....?

नज़र-ए-इनायत कम है आजकल,
हमें तो अब शक हो चला है,
कहीं ऐसा तो नहीं हमदम,
हम से बेज़ार हो चला है,
कहीं उसे....................!!!
कोई और तो नहीं मिला है....??

पैगाम-ए-मुहोब्बत भेजा था,
कोई जवाब न आया उधर से,
चुभन सी दे गयी ये बात,
सीने में घर कर गयी कसम से |

कितना तीखा है ये ज़ख्म,
जो उसने दिया है हमें,
पहली बार हुआ था शायद,
तभी तो अलेहदा किया है हमें |


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