मैं,
इन आँखों में,
डूबना चाहती हूँ,
छलकता जाम दो.....!
कितनी,
व्याकुल हूँ मैं,
ज्ञात है मुझे,
आधी-अधूरी नहीं,
एक पूरी शाम दो....!
टुकड़ों में,
बंटकर अब,
नहीं जीना चाहती हूँ,
ऐसा इंतज़ाम दो.....!
मेरी,
सुनी रातों को,
अपने आलिंगन से,
सुनहरा अंजाम दो....!
इस अंग से,
अमर-बेल सा,
लिपट कर तुम,
मुझे प्रेम-दान दो....!
स्मरण रहे,
वो स्पर्श,
सदैव अंतर्मन में,
कुछ ऐसी पहचान दो....!
क्या मैं,
इस काबिल भी नहीं,
जो तुम,
इस रिश्ते को,
कोई नाम दो......?
मुझे,
घुटन हो चली है,
इस तृष्णा से,
हो सके तो अब,
तृप्ति-पान दो.........!
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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