चांदनी में चाँद नहाया हुआ सा लगता है,
ये बदन दिलदार की बाहों में,
समाया हुआ सा लगता है,
नज़ाकत भरी नज़रे जो कभी उठे तो,
महबूब से शरमाया हुआ सा लगता है |
न ऐसे देखो कि पानी-पानी हो जाऊं मैं,
न ऐसे छेड़ो कि दीवानी हो जाऊं मैं,
सरकते हुए हाथों का मर्म अब,
लरजते हुए होंठों तक न आये कहीं,
ये तन बोझिल सा लगने लगा है,
कहीं अब डगमगा न जाऊं मैं.....?
नज़दीकियों की तपिश का इतना असर है,
कि हर चीज़ इसके आगे बे-असर है,
हरारत नशा बनकर जिस्म में मेरे,
साँसों को महकाने लगी है,
पलकों से पलकों की कही बातें,
धड़कनों तक अब जाने लगी हैं |
साया उसका मेरे साये को लपेटे हुए है,
जैसे दो-जहाँ की सारी खुशियाँ वो,
अपनी बाँहों में समेटे हुए है,
हल्की-सी हरकत मेरे रोंगटे खड़े कर जाती है,
उसके आगोश में दुनिया सिमट रह जाती है |
ये सुरूर, ये ख़ुमार, ये चाहतों की बारिश,
यूँ हीं होती रहे...........है मेरी दिल-ए-ख्वाहिश,
उसके मद-भरे नैनों का रस पीना चाहती हूँ,
हाँ मैं बस......... उस एक पल को जीना चाहती हूँ |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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