इन आग की लपटों में हम,
झुलसते चले जायेंगे,
जो तू न आया तो,
सुलगते ही रह जायेंगे,
राख का ढेर बनने में,
अब कोई कसर नहीं है,
जो ऐसा हुआ तो,
सब इलज़ाम तुझपर ही आयेंगे |
शमशान के लिए कुछ,
बच भी न पायेगा,
तेरे आने से पहले ही,
वो तो खो जायेगा,
उड़ जाएगा दूर किसी अंधड़ में,
वहाँ जाकर भी तब,
तू क्या कर पायेगा.....?
मेरी यादों को सीने से लगाकर,
तब तुम न रोना कभी,
मैं साथ नहीं तो क्या,
अफ़सोस न करना कभी,
एक शमा की तरह रोशन रहूंगी,
न बनना परवाना कभी,
तुम जलो साथ शमा के,
ये मैं ना चाहूँ कभी |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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