लालसा,
तुमसे मिलने की,
बस पीछे-पीछे,
भगाती है,
क्या करूँ.....?
प्रतीक्षा,
क्षण-क्षण,
रूप बदलकर,
डराती है,
क्या करूँ.....?
भय,
तुम्हे खोने का,
सोचते ही मेरी,
रूह थर्राती है,
क्या करूँ.....?
ये व्याकुलता,
निस-दिन,
यूँ ही बढ़ती जाती है,
क्या करूँ.....?
मन की अधीरता,
इच्छाओं को,
और जगाती है,
क्या करूँ.....?
विरह की अग्नि,
मेरे तन को,
तिल-तिल जलाती है,
क्या करूँ.....?
प्रियवर,
कब होगा आगमन,
मिलन की चाह,
रात-दिन तड़पाती हैं,
क्या करूँ.....?
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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