Saturday, March 6, 2010 at 5:30PM
कितना रोका था हमने,
बेलगाम आंसुओं को.
फिर भी छलक आये,
और तुम मुस्कुराये |
दिलों के तार चाहे,
कितना कि जुड़ जाएँ,
मगर तोड़ आये,
और तुम मुस्कुराये |
छवि हमारी तेरे दिल में,
सिमट कर रह गयी,
हम उफ़ तक न कर पाए,
और तुम मुस्कुराये |
साँसें थम सी जाती थी,
एक आहट पर तेरी,
बेबसी पे हम कसमसाए,
और तुम मुस्कुराये |
हमारी हंसी छीन कर,
ख़ुशी मिलती है ग़र,
तो लेलें जान हम सो जाएँ,
और वो हमेशा मुस्कुराएँ |
रोहिणी संकलन से एक रचना...........ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
कितना रोका था हमने,
बेलगाम आंसुओं को.
फिर भी छलक आये,
और तुम मुस्कुराये |
दिलों के तार चाहे,
कितना कि जुड़ जाएँ,
मगर तोड़ आये,
और तुम मुस्कुराये |
छवि हमारी तेरे दिल में,
सिमट कर रह गयी,
हम उफ़ तक न कर पाए,
और तुम मुस्कुराये |
साँसें थम सी जाती थी,
एक आहट पर तेरी,
बेबसी पे हम कसमसाए,
और तुम मुस्कुराये |
हमारी हंसी छीन कर,
ख़ुशी मिलती है ग़र,
तो लेलें जान हम सो जाएँ,
और वो हमेशा मुस्कुराएँ |
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