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Saturday, October 30, 2010

जैसे जानते नहीं...!!! "रोहिणी संकलन" से...


वो मिले महफ़िल में ऐसे की जानते नहीं,
देखा यूँ......... की हमें पहचानते नहीं,
नज़रों को हमसे चुराए चले गए,
कतार में हम भी है पर मानते नहीं |

सुना है महफिलें ही अक्सर रुसवा करती हैं,
साज़-ए- दिल में क्या है, बयां करती हैं,
ये जहाँ जान जाये न कहीं बेकरारी को,
इसलिए हर एक सांस ये दुआ करती हैं |

कभी कनखियों से देखकर गुज़ारा करते हैं,
कभी झरोखों से इशारा करते हैं,
पर्दा नशीनों की हालत ही कुछ ऐसी है,
अक्सर छुप-छुप कर ही नज़ारा करते हैं |

छुपते फिरते हैं लोगों से नज़रें चुराए,
कहीं पढ़ न ले निगाहों में अरमां छुपाये...??
खलिश इस दिल की जीने नहीं देती,
यही सोचते हैं कैसे इस दिल को मनाएं...??

उनकी इस हरकत पर तिलमिलाहट होती है,
बैचैन करती है वो कस-मसाहट होती है,
सुरूर चाहत का सर चढ़ कर बोलता है,
कोई जवाब न आये उधर से तो छट-पटाहट होती है|

ऐ खुदा मेरे यार को सलामत रखना,
उसे किसी की नज़र न लगे ये ध्यान रखना,
अभी तो जिंदगी कोसों चलनी है उसे,
हो सके तो सफ़र में ख़याल रखना |

रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

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