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Wednesday, October 20, 2010

विडम्बना...!!! "रोहिणी संकलन" से...

Created on 01/10/10 at 9:15

ये कैसी विडम्बना है हमारी.......??
आखिर क्यों है ये लाचारी.........??
क्या हम सब इंसान नहीं हैं......??
अगर हैं......तो क्या एक जान नहीं हैं...??

एक मूल है, एक ही भाषा अपनी,
मात्र यही एक परिभाषा अपनी,
एक प्रान्त है, एक खान-पान है,
जिस पर हमको स्वाभिमान है ||

फिर काहे का द्वन्द छिड़ा है......??
क्यों हर कोई एक-साथ भिड़ा है......??
है तो एक मिट्टी से ही जन्मे,
फिर क्यों हैं लगे... इक-दूजे को छलने..??

ये अलगाव ही था जो बरसों तक,
आपस में हमको बंटवाता रहा,
पास न आ पाया कोई भी,
एक दूसरे को मरवाता रहा ||

तभी कई सदियों तक हमने,
क्रूरता का ही पान किया,
पता नहीं क्या-क्या झेला है..??
अपनों का बलिदान दिया ||

वो जो उच्च शिखर पर बैठा,
अपना उत्तराँचल है ऐसा,
हम से है ये आस लगाए,
कोई उसकी भी सुध ले आये ||

मत सोचो अपने ही लिए तुम,
कुछ उसका भी ध्यान करो,
आपस में यु क्यों कटते हो,
अपनों का तो मान रखो ||

उसकी गरिमा हमें सिखाती,
जड़ को यूँ मज़बूत करो,
कोई तुमको हिला न पाए,
अपनी ऐसी नीव धरो ||

आओ ऑंखें खोले अपनी,
भेद-भाव को दूर करें,
इस से पहले.....कि कोई आकर,
हमको हमसे दूर करे ||

एकता को शक्ति बनाकर,
बात करें बदलाव की,
इक दूजे पर मरहम लगाएं,
क्यों सोचे फिर घाव की ||

कार्य बहुत हैं राह कठिन है,
समय न यूँ बर्बाद करो,
मिलकर साथ हमें है चलना,
उत्तराँचल आबाद करो ||


"रोहिणी संकलन" से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

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