created on September 27th 2010 Monday at 5:30pm.
दुखती रगों को न छेड़ना, ये बड़ा दुःख देती हैं,
हाथ कहीं लगता है, और छट-पटाहट कहीं होती है..!
जिस तरह कोई दबी याद, दिल के किसी कोने में बंद,
फिर से अक्स बनकर, रूबरू हो जाती है...!
दुखती रग भी वैसे ही, किसी के छू जाने से,
अनजाने मन से ही सही, पर हल्की चुभन दे जाती है..!
इससे बचकर रहना, भूल से भी कुछ न कहना,
मुंह अगर खोला भी तो, जिंदगी भर तड़पाती है...!
राज़ छुपाने में जो मज़ा है, खोलने में कहाँ..?
असलियत खुलने पर तो, जान पे बन आती है..!
ये कभी मत सोच, कि कसर बाकी थी कुछ करने में,
जितना करो, सीने में कोई कसक तो रह ही जाती है..!
न जी ऐसे ही तनहाइयों में, सर को झुका कर तू,
यादें साया बनकर अक्सर, इर्द-गिर्द मंडराती हैं..!
किसी ने सच ही कहा है, गड़े मुर्दे न उखाड़ना,
उन्हें उखाड़ने से...... सिर्फ बदबू ही आती है..!
ग़र ये सिलसिला यूँ ही चले, ज़िन्दगी पुर-ज़ोर चले,
चाहे सघन अँधेरा हो फिर भी, धुप तो निकल ही आती है..!
रिश्ता जितना पक्का रहे, उतना ही सफ़र अच्छा है,
जिंदगी तो चलने का नाम है, आगे ही बढती जाती है..!
जस्तजू और आरज़ू भला कहाँ पुरे हुए हैं किसी के,
ये ख्वाहिशें हैं..... पूरा करते-करते जान निकल जाती है..!!
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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