Wednesday, September 15, 2010 at 4:01pm
दस्तक दे गयी एक नज़र उनकी,
दरवाज़े पर अहिस्ता से,
कह गयी कुछ बातें अनकही,
दरवाज़े पर अहिस्ता से |
दूर दरख्तों के पत्तों की आहट,
सुनते हैं अहिस्ता से,
बेसब्री मैं खोये हुए हैं,
और बेचैनी है अहिस्ता से |
एक कहानी अनछुई सी,
छोड़ गए अहिस्ता से,
एक निशानी बन गयी अब,
जो दे गए अहिस्ता से |
चुप रह कर भी राज़ दिलों के,
खोल गये अहिस्ता से,
आरज़ू है मिलने की तुमसे,
बोल गए अहिस्ता से |
शाख पर बैठा वो पंछी,
उड़ गया अहिस्ता से,
आँख से ओझल हुआ और,
गम हुआ अहिस्ता से |
जिंदगी अब एक पहेली,
बन गयी अहिस्ता से,
इसकदर जब दूर मुझसे,
तुम गए अहिस्ता से |
ये गली, ये घर, ये कोने,
पूछें अब अहिस्ता से,
आ भी जाओ के बुलाती हैं,
ये बाहें अहिस्ता से ||
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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