created on 25/09/10 at4:00pm
दास्तान-ए-मुहोब्बत क्या सुनाऊं,
यूँही चलते-चलते,
समां गुज़र ही जायेगा,
शाम ढलते-ढलते |
बेताबी इस दिल की,
न जाने कहाँ खो गयी,
भोले-भाले मन को,
इक उदासी सी दे गयी |
ख़ामोशी इस दिल की मुझे,
जीने भी नहीं देती,
सूरत जो तेरी, इन आँखों में बसी है,
मरने ही नहीं देती |
तुम दिल में हो मेरे,
तुम्ही निगाहों में,
कि नहीं आ सकता,
कोई दूसरा इन बाँहों में |
अब ये जिंदगी मेरी,
तेरे ही तो नाम है,
कि जी रहे हैं हम,
इस दिल को थामके |
मंजिलें तो राह में,
अक्सर मिल ही जाती हैं,
कारवां गुज़र जाते हैं,
दास्तानें रह जाती हैं |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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