ऐसा खिलौना जो खेले दिलों से,
कब मैंने चाहा था मुझको मिले...??
ऐसा वो फूल जो खुशबू ही न दे,
कब मैंने चाहा था गुल में खिले...??
ऐसी वो यादें जो बेचैन कर दें,
कब मैंने चाहा कि दिल में रहे...??
ऐसा समां जो कहे कुछ न हमसे,
कब मैंने चाहा फिज़ां मे रहे...??
भंवरा जो डोले इधर से उधर तक,
कब मैंने चाह वो बेसुध रहे...??
कलियाँ बुलाये उसे जो चमन में,
कब मैंने चाहा वो न उड़ सके...??
तूफान जो आये कहर बरसाए,
कब मैंने चाहा तबाही मचे...??
सावन जो आये बूंदे गिराए,
कब मैंने चाहा कि आंसू गिरे...??
मेरी जो चाहत है वो मेरी किस्मत है,
कब मैंने चाहा कि फितरत बने...??
मेरी हर एक सांस उनके लिए है,
जिसे मैंने चाह है घड़ियाँ गिने...??
उसे मैंने देखा उस मैंने पाया,
जिसे मैंने पूजा है पलकों टेल,
वाही मेरा हमदम वाही मेरा सबकुछ,
उसी को निभाना है जब वो मिले
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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