मुसल-सल अश्क बहने की एवज़ में,
चंद लम्हात ख़ुशी के मिले,
तो क्या मिले.....?
सीने पर पत्थर की मानिंद ये बोझ,
उठाये नहीं उठता मुझसे....!
उनसे राफ़्ता हुआ जो मेरा,
तो जाना ये जिंदगी.........!
दो-पाटों में बँट कर,
फँस गयी है कहीं,
एक........जिसकी मैं पहचान हूँ.........!
दूसरा...जिसे जानकर भी अनजान हूँ...!
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है ।प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है ।प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo
No comments:
Post a Comment