फासले ग़म को हवा देते हैं,
तेरा इख्तयार है मुझ पर,
चल कुछ लम्हे चुरा लेते हैं,
बंदिशें तोड़ खामोशियों की,
पीकर देख अगन भीतर की,
ये लगाव, ये खिंचाव,
कितना सच्चा है,
ऐसे मे....।
क्या मूक रहना अच्छा है ??
तेरा इख्तयार है मुझ पर,
चल कुछ लम्हे चुरा लेते हैं,
बंदिशें तोड़ खामोशियों की,
पीकर देख अगन भीतर की,
ये लगाव, ये खिंचाव,
कितना सच्चा है,
ऐसे मे....।
क्या मूक रहना अच्छा है ??
उखड़ती साँसों मे,
अल्फ़ाज़ों का समंदर,
यूं-ही सिमट कर रह गया|
जो लम्हा जहां था,
बस वहीं पर थम गया |
समय रहते गलती,
सुधार तो दी हमने,
पर उसी लम्हे की,
ताज-पोशी मे,
जिंदगी गुज़ार दी हमने |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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