बरखा भी नि झुरौणी,
येक बूंद पाणिक भी नि औणी,
गोर-बाछरोंकु लराट छ जोड्यु,
गुठ्यार मा,
त्यु द्योर भी नि बर्खीणी |
हे मेरी ब्वे, निरास हवेगे,
कुएड़ी-कुएड़ू छ दिखेड़ी,
पार डाँड तू,
पण ते द्योरतें,
कन चुकपट पोड़गे |
सुबेर 4 बजी उठी तें,
धार बिटिन पाणि लैगें,
गुठ्यार्कु मोल गाड़ ले,
भैंसी ज्वा रमौणी छ,
वींमू घास भी धोल ले,
पण चौसिंग्या लगोठ,
मजाण कख लूकिगे |
म्यार दग्ड्या सौब घस्यार,
कबारि पैट गेन,
थक गेन बिचार,
मैं धई लगे तेन |
दाथुड़ी अर डोरीड़ि,
कुजाणी कख धोलि मैन,
खोजि-खोजिक पराण मेरु,
जुकीड़ी तु ऐगे |
"जीहोर" द्याखल त,
खैर नि छ मेरी,
कल्योकि त फंड फुका,
पाणिन भरलु तब गेरी |
खाणु पकौण त दूरकि बात छ,
चुल्लू भी नि जगौण देणी,
हे मेरी माँजी तब मैन,
क्या सुदी ख़ाब खेच्णि...... ?
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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