तेरी रह-गुज़र की ख्वाहिश में,
दिल-ए-सुकूं मिटा बैठे,
दुरुस्त-ए-ज़िन्दगी ख्वाब ही रही,
सारी आज़माइश लगा बैठे |
वो यादें ही क्या जो ख़त्म हो,
सिल-सिले उनके नागवार गुज़रे,
चाहत की डोर पकड़े बैठे हैं,
हम तो अब तक उनके आसरे |
बे-वजह, बे-वक़्त,
बे-लगाम ये जिंदगी,
नासाज़-ए-हाल,
बा-बस्ता हैं यारों,
उनकी एक झलक,
पाने को जानिब,
हाल-ए-दिल तरसता है यारों |
ये नज़रें जो चुप-सी रहती हैं,
खामोश ही सही,
कुछ तो बयां करती हैं,
उल्फत के लिए यही काफी है,
मेरे दोस्त.................
जो ऑंखें कहती हैं,
वो अक्सर,
जुबां नहीं कहती |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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