Friday 2nd April 2010 at 9:46am | Edit Draft | Discard
जिस मिट्टी को मैने खून से सजाया है,
तपती धूप मे अपना पसीना बहाया है,
धरती का सीना चीर जिसमें हल चलाया है,
उस पर मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
दिन-प्रतिदिन मैं बद से बद्तर होता जा रहा हूं,
पानी की बूंद के लिये अस्तित्व खोता जा रहा हूं,
क्या होगा परिवार का ? ये सोच रोता जा रहा हूं,
बस अब मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
गगन की ओर टकटकी लगाये आंखें ये कहती हैं,
अब बरसेगा - तब बरसेगा आस में रहती है,
इस गर्मी की झुलसाहट को आखिर क्यों सहती है?
जरूरी है मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
ऐ मेघों के देवता अब तो मुझपर पर तरस खा,
रूखे मन से ही सही कुछ देर तो बरस जा,
क्या तब सुनेगा जब यम मेरे ये प्राण हरेगा?
लज्जित न कर मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
पेट की अग्नि और मन की पीडा अब कही नहीं जाती,
भूख से बिलखती बच्चों की चीखें अब सही नहीं जाती,
मांस से झलकती हड्डियों की बनावट छुई नहीं जाती,
रहम कर मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
जिस मिट्टी को मैने खून से सजाया है,
तपती धूप मे अपना पसीना बहाया है,
धरती का सीना चीर जिसमें हल चलाया है,
उस पर मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
दिन-प्रतिदिन मैं बद से बद्तर होता जा रहा हूं,
पानी की बूंद के लिये अस्तित्व खोता जा रहा हूं,
क्या होगा परिवार का ? ये सोच रोता जा रहा हूं,
बस अब मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
गगन की ओर टकटकी लगाये आंखें ये कहती हैं,
अब बरसेगा - तब बरसेगा आस में रहती है,
इस गर्मी की झुलसाहट को आखिर क्यों सहती है?
जरूरी है मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
ऐ मेघों के देवता अब तो मुझपर पर तरस खा,
रूखे मन से ही सही कुछ देर तो बरस जा,
क्या तब सुनेगा जब यम मेरे ये प्राण हरेगा?
लज्जित न कर मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
पेट की अग्नि और मन की पीडा अब कही नहीं जाती,
भूख से बिलखती बच्चों की चीखें अब सही नहीं जाती,
मांस से झलकती हड्डियों की बनावट छुई नहीं जाती,
रहम कर मुझे बूंदों की गर्जन चाहिये,
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
मां मैं भूखा हूं..............................
मुझे इस माटी में सृजन चाहिये॥
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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