ज़िन्दगी की रफ़्तार में,
मदहोश जवानी है,
नशेमन चूर है,
हर शक्स रूमानी है,
रात की चांदनी में,
खोया समां है,
फिर भी क्यों चाहत,
धुवां-धुवां है ?
शहर की गलियों को,
रस में डुबोती,
मय के प्यालों से,
नस-नस भिगोती,
दिन में बसाए हैं,
सब आशियाना,
रात को ढूंढे क्यों,
ठौर-ठिकाना ?
ये बेलगाम सी,
बहती हवाएं,
इनको न जाने,
किस ओर ले जाएँ,
वक़्त है थोडा,
है खुदगर्ज़ ज़माना,
गर हो सके तो,
होश में आना |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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