by रोहिणी शैलेन्द्र नेगी on Monday, October 31, 2011 at 3:38pm
ये रूह क्यों विचलित है...?
काया को छोड़-छोड़,
जाने किधर भाग जाती है...?
जीवन में स्थिरता चाहे भी तो,
अवांछनीय पूर्ति के लिए,
क्यों भटकाती है...?
ये रूह क्यों भ्रमित है...?
प्यासे मन में आग लगा के,
भूखे तन को क्यों सुलगाती है...?
रह-रहकर परिस्थिति-वश,
इच्छाओं को ग्रास बना कर,
असंतुष्ट क्यों कर जाती है...?
ये रूह क्यों अचंभित है...?
एक ही जगह लेटे-लेटे,
उकताने क्यों लग जाती है...?
ये स्याह-रात ही,
सच्चाई है उसकी,
फिर अनदेखा क्यों कर जाती है...?
शायद अनजान है इस बात से,
कि कब्र में साथ लेटा,
उसका ही जीवन साथी है |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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