घरबार उजड़ी गेन,. पठाल रड़की गेन,
तिबारी माकु डिंडाल,.खिसिक खिसिक,
सरकी गेन,
मैं तैं त क्वीनी दिखेंदु,. औन्दु यख,
कुजाणि हमार रैबासी,. कख भटकी गेन,
गुठ्यार की रौनक,, सब चौपट ह्वेगे,
गोर बाखर क्वीनी रखुदु,.सबतें चुकपट ह्वेगे,
घास गडोलों की परवाह कैक छ,,ब्वांड जानकी अब,
सभुतेन निरपत ह्वेगे,
अपणा घर की हालत,,मैन तुम्मा क्या बातोंण,
यख वखकी छ्वीं बाथ,, मैन तुम्मा क्या लगौंण,
बूड़ बुड्या याखुली घर छन पोड्याँ,
जॉन ऊँसन देखण छ,,ऊँका घरबार छन छोड़्यां,
पुंगड़ डोखरकी क्या लगौंण,,, कवि एतेन उमा हौळ लगेजौ,
सुखी सुखिक बेजान ह्वेगें,, कवि उमा भी रोपण करजौ,
तिबारिमा बैठिक बड़ाजिकु,,कपालिपर हाथ छ धारयूं,
क्याकन, कनकै कन,. सोचिसोचिक प्राण छ सुकैयुं,
ऐजा-ऐजा मेरा लठ्याला, ,एतेन यख मैंभी देखिजा,
कनरण मैन याखुली,, ये किनार,
मैन छोड़िक कखिना जा,
मेरी बुदेंदी आँख्यूंमा,, थोड़ासी तरसखा,
तुम्हारी पछाण यखी बीटिन छ,, मैंमा यान खौरी नखा,
हमारी बापूति हमारी धरोहर,, भट्यांणछ लगीं,
पिछने मुड़िक देखजा,, खुदेंणछ लगीं,
वींकी बिपदा, वींकी, पीड़ा, ,कैननी सै सकण,
मेरी माँ मेरी धरोहर अब रोण छ लगीं,..
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
No comments:
Post a Comment