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Monday, June 20, 2016

"तारों का जंजाल"...!!! "रोहिणी संकलन" से...


क्यों इन लकीरों ने,
सीमायें तय कर दी हमारी....? 
जहाँ देखो इनकी रवायत है,
खींचना ही था....... 
तो कुछ और खींचता ये जहां,
क्यों हर तरफ, 
इन रेखाओं की बनावट है....? 

रास्ते सिमट कर,
रह गए हमारे,
सीमा-रेखा को बांधा गया,
इंसान ही इंसान का, 
दुश्मन बन बैठा,
जब भी इसको लांघा गया |

इंसानियत पर हैवानियत,
हावी होती चली जा रही है,
मासूमियत.......... 
अब दहशत बनकर,
दिन-ओ-दिन तब्दील, 
हुई जा रही है |

ऐसे में अपनों का साथ,
शुक्र है..........
ये 'बेतार के तार' (wireless or net)
जुड़े हैं,
अपने गलियारे, चौराहों,
शहरों से जो दूर बसे हैं |

मिटटी की सौंधी-सौंधी-सी,
खुशबू जिनसे गुज़र के आये,
दूर-दूर बैठे अपनों को,
खुशियों से रु-ब-रु कराये |

तारों का जंजाल नहीं बस,
ये तो मायाजाल है,
कोना-कोना बचा न इस से,
चीज़ बड़ी कमाल है |



रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

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