Mon Feb 15th at 1:59pm |
मुट्ठी में कौन बाँध पiया है प्यार को,
ये तो उस रेत के मनिन्द है,
जितना कसते हैं फिसलती जाती है |
आग़ोश में कौन भर पाया है चाँद को,
ये तो बस एक परछाई है,
छूने की चाह में सरकती जाती है |
सीमा मे कौन बान्ध पाया है ममता को,
ये तो प्रेम कि नदिया है,
जितना बांटते है बढ़्ती जाती है,
शोषण करके भी कौन रोक पाया है क्रन्ति को,
ये तो एक ज्वाला है,
बुझाने की चाह मे धधकती जाती है,
इर्श्या करने से कौन बचा पायेगा स्वार्थी को,
ये तो एक कुन्ठा है,
जलन की आग मे सुलगती जाती है,
आजतक कौन दबा पाया है इच्छाओं को,
ये भी एक शक्ति है,
मिलन की आस मे व्यक्ति खिंचता चला जाता है,
रोहिणी संकलन से एक रचना............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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