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Wednesday, March 24, 2010

बैठी एकांत में....!!! "रोहिणी संकलन" से.....

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बैठी एकांत में सोच रही थी, ऐसा क्यों होता है ??
अकेलापन मनुष्य को काटने को क्यों दौड़ता है ??

अन्दर से आवाज़ आई साथ चल, पता चल जाएगा,
अकेला देखकर तो, हर कोई काटने आएगा||

अकेलापन......क्या अंतर्मन को झकझोर देता है ??
बैठी एकांत में सोच रही थी ऐसा क्यों होता है ??

स्वयं से पूछा....गर कोई काटने आया तो संभल सकेगी क्या ??
जीवन के कटु-सत्य का बोझ सह सकेगी क्या ??

लोग कहते हैं........व्यस्तता जीवन का आधार है,
व्यस्त रहना और व्यस्त दिखना, एक अच्छा विचार है,

पर उसका क्या, जब व्याकुल मन व्यथित होता है ??
बैठी एकांत में सोच रही थी, ऐसा क्यों होता है ??

बादलों की सैर..... कौन कर पाया है आज तक ??
ऑंखें मूँद के सोचें तो भी पता न चलेगा,

इसका काम तो......... बस बरसना ही है,
क्या कोई इसे कभी चीर भी पायेगा ??

लालसा को रहने दो, आखिर मन इसे क्यों ढोता है ??
बैठी एकांत में सोच रही थी, ऐसा क्यों होता है ??

रोहिणी संकलन से एक रचना............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

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