Wed 25th March 2010 at 6:27pm
प्यार को छलनी से छाना,
गिरा छन-छनाकर,
छलक सा गया फिर ज़मीं पर |
सोचा की छलके ना,
फिर भी छलक कर गिरा,
छल-छलाया वो फिर वहीँ पर |
छलका के उसको,
छलकना सिखाया था,
अब वो छलकने में माहिर सही पर |
इस छल-छलाहट में,
दिल छल-छालाये पर,
जाकर फिर भी गिरा वो हमीं पर |
छलके तो जाना,
छलक कर ही सीखा,
केवल छलकना ही ठीक नहीं पर |
उसके छलकते ही,
छलनी हुआ मन,
खोजा था हमने नहीं थे कहीं पर |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
ये पंक्तियाँ मैंने उन प्रेमियों के लिये लिखी है जो प्यार का दावा करते हैं पर जब उन्हें प्रेम की कसौटी पर आँका जाता है तो वो औंधे-मुंह गिरते हैं......!!! छलकने का मतलब है वो इस पर खरे नहीं उतरे......
ReplyDeletesahi kaha aapne rohini ji.
ReplyDeletepyar ki parakh to use parakhne se hi pata chalti hai.