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Wednesday, March 24, 2010

प्यार की परख....!!! "रोहिणी संकलन" से.......

Wed 25th March 2010 at 6:27pm

प्यार को छलनी से छाना,
गिरा छन-छनाकर,
छलक सा गया फिर ज़मीं पर |

सोचा की छलके ना,
फिर भी छलक कर गिरा,
छल-छलाया वो फिर वहीँ पर |

छलका के उसको,
छलकना सिखाया था,
अब वो छलकने में माहिर सही पर |

इस छल-छलाहट में,
दिल छल-छालाये पर,
जाकर फिर भी गिरा वो हमीं पर |

छलके तो जाना,
छलक कर ही सीखा,
केवल छलकना ही ठीक नहीं पर |

उसके छलकते ही,
छलनी हुआ मन,
खोजा था हमने नहीं थे कहीं पर |

रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क करें || rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

2 comments:

  1. ये पंक्तियाँ मैंने उन प्रेमियों के लिये लिखी है जो प्यार का दावा करते हैं पर जब उन्हें प्रेम की कसौटी पर आँका जाता है तो वो औंधे-मुंह गिरते हैं......!!! छलकने का मतलब है वो इस पर खरे नहीं उतरे......

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  2. sahi kaha aapne rohini ji.
    pyar ki parakh to use parakhne se hi pata chalti hai.

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