ये स्पर्श बूंदों का,
टिप-टिप कर,
मेरे हाथों पर गिरना,
कभी तीव्र तो,
कभी मद्धम-मद्धम,
मेरी हथेलियों पर,
टपकना |
मुट्ठी मे,
बंद कर लेने को,
अब तो जी चाहता है,
हरदम,
आज नाचने को,
जाने क्यों,
फिर करता है,
ये मेरा मन |
खिड़की पर,
बैठे-बैठे मुझको,
कितना इंतज़ार,
कराती हैं ये,
देख नहीं सकता,
इनको मैं,
तभी शायद,
रुलाती हैं ये |
देखूँ तो सही,
इनमे ऐसा क्या है,
छू कर तो,
महसूस करूँ,
अन्यथा सर्र से,
फिसल जाएंगी,
जल्द ही,
फिर रिक्त हथेली,
सँवारता रहूँ |
रोहिणी संकलन से एक रचना............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति ले|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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