जन-मानस के मन-मस्तक पर,
चढ़ा ये कैसा रंग.............?
एकाकीपन लगता है कहीं,
हो न जाए भंग................!
इंद्र-धनुष के रंगों में सब,
सज गए घर-गलियारे,
छुप-छुप कर ओने-कोने से,
आने लगी फुहारें,
मस्तों की टोली रास्तों पर,
उमड़-घुमड़ कर दौडे़ं,
जो दिख गया उसी पर लपके,
कोई न किसी को छोडे़,
हल्के पर गहरे रंग ने है,
अपनी छाप को छोड़ा,
रह गए सारे दंग न निकले,
रगड़ के थोडा़-थोडा़........!
होली है.....................!!!!
रोहिणी संकलन से एक रचना............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति ले|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
चढ़ा ये कैसा रंग.............?
एकाकीपन लगता है कहीं,
हो न जाए भंग................!
इंद्र-धनुष के रंगों में सब,
सज गए घर-गलियारे,
छुप-छुप कर ओने-कोने से,
आने लगी फुहारें,
मस्तों की टोली रास्तों पर,
उमड़-घुमड़ कर दौडे़ं,
जो दिख गया उसी पर लपके,
कोई न किसी को छोडे़,
हल्के पर गहरे रंग ने है,
अपनी छाप को छोड़ा,
रह गए सारे दंग न निकले,
रगड़ के थोडा़-थोडा़........!
होली है.....................!!!!
रोहिणी संकलन से एक रचना............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति ले|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
No comments:
Post a Comment