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Wednesday, May 22, 2013

पतझड़...!!! "रोहिणी संकलन" से...


ये रस्ते चले जा रहे हैं, 
जाने कहाँ हताश से..? 
शायद ये भी मसरूफ़ हैं, 

मंज़िलों की तलाश मे |

कोई भी तो नज़र न आए, 
कैसा ये अंधड़ है.........? 
डरे हुये, सिमटे हुये से, 
लोग सभी नदारद हैं, |

इस धुंधलके मे गुम होकर, 
पथिक हजारों भटक गए, 
कामनाओं और लालसाओं के, 
त्रिशंकु मे लटक गए |

पतझड़ जाये तो सावन, 
अपना सुंदर मुख दिखलाए,
देख कोंपलें फूटें, 
बंजर ज़मीं भी अंकुर ले आए |

काश ये सूखा मंज़र हो तब्दील, 
घटाएँ छा जाएँ,
हो ऐसा सौभाग्य सभी का, 
मस्त बहारें लौट आयें |



रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com

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