ये रस्ते चले जा रहे हैं,
जाने कहाँ हताश से..?
शायद ये भी मसरूफ़ हैं,
मंज़िलों की तलाश मे |
कोई भी तो नज़र न आए,
कैसा ये अंधड़ है.........?
डरे हुये, सिमटे हुये से,
लोग सभी नदारद हैं, |
इस धुंधलके मे गुम होकर,
पथिक हजारों भटक गए,
कामनाओं और लालसाओं के,
त्रिशंकु मे लटक गए |
पतझड़ जाये तो सावन,
अपना सुंदर मुख दिखलाए,
देख कोंपलें फूटें,
बंजर ज़मीं भी अंकुर ले आए |
काश ये सूखा मंज़र हो तब्दील,
घटाएँ छा जाएँ,
हो ऐसा सौभाग्य सभी का,
मस्त बहारें लौट आयें |
रोहिणी संकलन से एक रचना...............ये रचना रोहिणी की निजी संपत्ति है, प्रकाशित करने से पहले कृपया संपर्क कर अनुमति लें|| rohinisnegi@gmail.com/rohininegi@yahoo.com
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