Pages

Wednesday, May 22, 2013

अंतर-द्वंद...!!


एक दिन हिट्द-हिट्द इन्नी सुद्दी,
खुट डगमगे गैन....|
यु सोचिक, कि कख छ जाणी ?
मैं लड्खड़े गैन.............!
     
आकासकि ऊंचे माँ,
मजाण कख ख्वेगें..........?
बादलक ऐंच तरितें,
कब अग्ने निकल्गे.......?
    
जन्नी मैन तौल देखि,
कैन ठहाकू लगाई,
डौरेन थर-थरेउन सरेलकु,
मजाण कैन मज़ाक उड़ाई ?

हल्की-सी खुसफुसाट,
कखि बिटिन सूणी मैन,
संभ्लितें हिट.....उद पोडि जैली,
बोल्न बैठगे मैंमा......!
        
वींकु मज़ाक मा करया बात्थ,
मेरी नसों मा ठहरगे,
सरेल जु गरम छ,
बरफ सी बणे गे...!
 
दिमाग शून्य हवेगे मेरु,
ब्याखंदान हवान्द बिथेक....!
कैन बोली होलु...?
सोचण बैठगे बैठीक........!
  
मैं नि होन्दु त तेरु अस्तित्व,
भला कख होन्दु...?
मेरी बदौलत ही तेरु,
यु मन छ चकड़ेंदु.....!

त्वेतें  सारू देतें मैन,
तिथगा ज्वान बणाई.....!
मैसन थामितें त्वेन,
अफरु हर-एक कदम बढ़ाई.....!
   
यूं बात्थोन मजाण किले,
मैं आघात पौंचाई,
आखिर कु छ यु......?
चल्दु-चल्दु फेर मैन खुट हिलाई...!
  
मन विचलित छ मेरु,
छ बडु उत्सुक......!
मेरी परिस्थिति पछाणितें,
व हवेगे भावुक........!

बोली वीन अप्णापन मा,
बेकार छ...!
ज्यादा "पर" न फैलो,
क्षमता नि छ....!

कथ्गा उड़ली....?
कख्तें जैली....?
त्वेन कमौण,
जल्दी संभल जा,
अभि निस भी औण.....!   

दूरी तय कन त्वेन,
बथों सन जकड़ी तें राख़,
रफ्तार ज्यादा होलि फिर भी,
कस्सी तें पकड़ी राख़.....!
  
न हो तू अखमुखां उद पोड़ें,
बाद मा पछ्तौंदी रे,
जु सन अपडु संभालिकार,
मैं भ्वीं छ भ्वीं..... मै मा समे जेलि, ईथगा त ध्यान कार.....!! 

No comments:

Post a Comment